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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verses 23–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 23-25

संस्कृत श्लोक

प्रत्यक्चेतनरूपाय स्वरूपाय नमोऽस्तु ते । चितये चेत्यमुक्ताय युक्त्या युक्ताय योग्यया ॥ २३ ॥ सर्वावभासदीपाय मह्यमेव नमोऽस्तु ते । चेत्यनिर्मुक्तचिद्रूपं विष्वग्विश्वावपूरकम् ॥ २४ ॥ संशान्तसर्वसंवेद्यं सच्चिन्मात्रमहं महत् । आकाशवदनन्तोऽहमप्यणोरणुराततः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अपना आत्मा ही परमेश्वर है जिसने जीवभाव पर विजय प्राप्त कर ली, इसलिए उसे नमस्कार करते हैं। चेत्य से रहित चिद्रूप, साक्षात्कार के योग्य मनन-निदिध्यासनरूप युक्ति-से-युक्त, सब पदार्थों के प्रकाशन में दीपक प्रत्यग्रूप ब्रह्म को नमस्कार हे । मैं जिसमें सब ज्ञातव्य वस्तुएँ शान्त हो चुकी, चेत्य से रहित चित्रूप, सर्वत्र विश्व को पूर्ण करनेवाला, सर्वव्यापक एकमात्र सच्चिदानन्दरूप हूँ। सर्वत्र व्याप्त मैं आकाश के समान अनन्त हूँ और अणु से भी अणु हूँ, इसलिए ये सब सुख-दुःख दशारूपी दृष्टियाँ मुझे प्राप्त नहीं कर सकती हैं