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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

ह्रियते दीयते वापि तत्किं कस्य किल क्षतम् । सर्वदा सर्वमेवाहं सर्वकृत्सर्वसंगतः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

वस्तुतः तत्वबोध से पहले भी जगत मैं ही था, इसलिए पहले भी न तो कुछ उत्पन्न हुआ था और न विनष्ट हुआ था, इस आशय से कहते हैं। मैं ही सदा सब कुछ सबका कर्ता ओर सर्वगत था। यह चेत्य भी मैं ही हूँ नया कुछ भी उदित नहीं हुआ