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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 22

इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग बलि के आख्यान के सिलसिले में पाताल का वर्णन तथा बली के राज्य का और वैराग्य से मेरु के शिखर पर विचार का वर्णन ।

9 verse-groups

  1. Verses 1–2अब “पद्मक्षको त्रिजगत' इत्यादि से विवेक होने पर त्रैलोक्य का ऐश्वर्य भी अत्यल्प है, ऐसा ज…
  2. Verses 3–5हे विभो, जैसे शरद्‌ ऋतु में आकाश से विशाल मेघ चला जाता है, वैसे ही मेरे चित्त से तृष्णा न…
  3. Verse 6हे विभो, फिर आप मेरी ज्ञानवृद्धि के लिए बलि की बोधप्राप्ति प्रकार को कहिये | गुरुजनों को…
  4. Verses 7–12श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, मैं आपसे बलि का उत्तम वृत्तान्त कहूँगा, आप उसे सुनिये । ज…
  5. Verses 13–18कहीं पर बड़े कट-कट शब्दों से जिनमें भू-राशियाँ भयभीत हैं और जो दुर्गन्धरूप से नारकीय जीवो…
  6. Verses 19–30उसकी ऐसी सामर्थ्य कैसे हुई, ऐसी आशंका होने पर कहते है । त्रैलोक्यरूपी रत्नों की कोश के सम…
  7. Verses 31–41पुनः दिन की एकमात्र कल्पना, पुनःरात्रि की स्थिति, फिर वे ही स्नान, भोजन, शयन आदि कार्य, अ…
  8. Verses 42–43ध्यान से संस्कार जाग्रत होने के कारण राजा बलि पहले स्वयं पूछे गये पिता के उपदेश की स्मृति…
  9. Verses 44–49है महामते, संसार सीमा की अवधि वह कौन कहा जाता है, जहाँ पर सब दुःखो ओर सुखों के सम्बन्ध के…