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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 3–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 3-5

संस्कृत श्लोक

शरदीवाम्बरादभ्रमदभ्रं मम चेतसः । विभो व्यपगतं सर्वं तृष्णाख्यं तन्महातमः ॥ ३ ॥ अमृतापूरितः स्वस्थः शीतलात्मा महाद्युतिः । तिष्ठाम्यानन्दवानन्तः सायं पूर्णं इवोडुराट् ॥ ४ ॥ अशेषसंशयाम्भोदशरत्समय किंत्वहम् । तृप्तिमेषां न गच्छामि वचसां वदतस्तव ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे विभो, जैसे शरद्‌ ऋतु में आकाश से विशाल मेघ चला जाता है, वैसे ही मेरे चित्त से तृष्णा नामक वह महातम हट गया है । अमृत से पूरित, आकाश में स्थित, शीतलस्वरूप, महाकान्तिवाले सायंकाल में पूर्ण चन्द्रमा के समान मैं अमृत से लबालब भरा हुआ, चिदाकाश मेँ स्थित, सन्तापशून्य चित्तवाला, महाकान्ति से युक्त ओर अन्तःकरण में आनन्द से पूर्ण हो स्थित हूँ। परन्तु हे सब सन्देहरूपी मेघों के निवारण के लिए शरद्‌ ऋतु के तुल्य, मुनिवर आपके इन वचनां से मुझे तृप्ति नहीं हो रही है