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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 42–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 42,43

संस्कृत श्लोक

अथाभ्युवाचासुरराडाः संस्मृतमिति क्षणात् । स्वात्मन्येव मनस्यर्थं सभ्रूभङ्गं विमर्शयन् ॥ ४२ ॥ पुरा किलेह भगवान्पृष्टोऽभूत्स विरोचनः । पिता मयात्मतत्त्वज्ञो दृष्टलोकपरावरः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

ध्यान से संस्कार जाग्रत होने के कारण राजा बलि पहले स्वयं पूछे गये पिता के उपदेश की स्मृति को विमर्श के साथ दिखलाते हैं। स्मृत अर्थ का मन में ही भौंह चढ़ाकर विचार करते हुए दैत्यराज क्षण भर में बोले कि मुझे स्मरण हो आया । प्राचीन समय में आत्मतत्त्वज्ञानी तथा लोक के विविध व्यवहारों को देख चुके अपने पिता भगवान विरोचन से मैंने पूछा था