Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 13–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, verses 13–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 13-18
संस्कृत श्लोक
महाकटकटाशब्दत्रस्तभूतपरम्परैः ।
क्वचिद्दुर्गन्धभूताभैरधोनारकमण्डलैः ॥ १३ ॥
आभूतलमभिप्रोतसप्तपातालमण्डलैः ।
क्वचिद्रत्नाकरैर्व्याप्तः पातालैर्विवरैरिव ॥ १४ ॥
सुरासुरशिरःसुप्तपादाम्भोरुहपांसुना ।
क्वचिद्भगवता तेन कपिलेन पवित्रितः ॥ १५ ॥
आसुरीसंभृतानन्तपूजनक्रीडनैषिणा ।
क्वचिद्भगवता तेन हाटकेशेन पालितः ॥ १६ ॥
तस्मिन्नसुरदोस्तम्भधार्यमाणमहाभरे ।
बभूव दानवो राजा विरोचनसुतो बलिः ॥ १७ ॥
साक्रन्देन समं सर्वैः सुरविद्याधरोरगैः ।
पादसंवाहनं यस्य सुरराजेन वाञ्छितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर बड़े कट-कट शब्दों से जिनमें भू-राशियाँ भयभीत हैं और जो दुर्गन्धरूप से नारकीय
जीवों के कर्म भासित हो रहे हैं, ऐसे नरकमण्डलों से सबसे नीचे वह व्याप्त है | कहीं पर नीचे के
नरक-प्रदेश से लेकर ऊपर हम लोगों के भूतल तक सात पुओं में पिरोई गई लोह ही सींक के समान
सात पातालं में पिरोए गये रत्नों के आकाररूप मेरू आदि पर्वतो से वह व्याप्त हैं एवं कहीं पर छिद्रो
की तरह अत्यन्त संकुचित पाताल के अवयवो से व्याप्त हे । कहीं पर वह जिसकी चरणकमल की
धूलि सुर और असुरों के मस्तकों पर रुप्त की भाँति विश्राम ले रही हे, ऐसे त्रिलोकवन्दित भगवान
कपिलमुनि द्वारा पवित्र बनाया गया है । कहीं पर असुर स्त्रियों से तैयार किये गये विविध उपकरणों
से पूजा ओर क्रीडा के अभिलाषी भगवान हाटकेश्वर से पह पालित है । उस पाताल में, जहाँ पर
असुरो के बाहुस्तम्भों से महान राज्यभार धारण किया जा रहा है, विरोचन के पुत्र बलिनामक दानव
राजा हुए । सब देवता, विद्याधर ओर नागों के साथ रोदनयुक्त देवराज इन्द्र ने जिसके पैर दबाने
की जवर्दस्ती इच्छा की