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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 19–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, verses 19–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 19-30

संस्कृत श्लोक

कोशस्त्रैलोक्यरत्नानां पाता सर्वशरीरिणाम् । धर्ता भुवनधर्तृणां यस्य पालयिता हरिः ॥ १९ ॥ ऐरावणस्य संशोषं यन्नाम्ना कटभित्तयः । केकयेवाहिहृन्नाड्यो जग्मुराजग्मुरार्तताम् ॥ २० ॥ प्रतापोग्रोष्मभिर्यस्य कल्पकाल इवाब्धयः । ययुः शोषोन्मुखाः सप्त सप्ततां कुपिताकृतेः ॥ २१ ॥ यदध्वराग्र्यधूमाभ्रराजयो वलिताब्धयः । ब्रह्माण्डकोटरस्यास्य सदा कवचतां ययुः ॥ २२ ॥ यस्य दृष्टिदृढाघातनुन्नाधारकुलाचलाः । विनमन्ति दिशः सर्वा लताः फलनता इव ॥ २३ ॥ लीलाविजितनिःशेषभुवनाभोगभूषणः । दशकोटीः स वर्षाणि दैत्यो राज्यं चकार ह ॥ २४ ॥ अथ गच्छत्स्वनल्पेषु युगेष्वावर्तवृत्तिषु । सुरासुरमहौघेषु प्रोत्पतत्सु पतत्सु च ॥ २५ ॥ अजस्रमतिभुक्तेषु त्रैलोक्योदारवृत्तिषु । भोगेष्वभजदुद्वेगं बलिर्दानवनायकः ॥ २६ ॥ मेरुश्रृङ्गशिखारत्नकृतवातायनस्थितः । एकदा चिन्तयामास स्वयं संसारसंस्थितिम् ॥ २७ ॥ कियन्तमिदमक्षुण्णशक्तिनैव मयाधुना । साम्राज्यमिह कर्तव्यं विहर्तव्यं जगत्त्रये ॥ २८ ॥ महता मम राष्ट्रेण त्रैलोक्याद्भुतकारिणा । किं वा भवति भुक्तेन भूरिभोगातिहारिणा ॥ २९ ॥ आपातमात्रमधुरमावश्यकपरिक्षयम् । भोगोपभोगमात्रं मे किं नामेदं सुखावहम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी ऐसी सामर्थ्य कैसे हुई, ऐसी आशंका होने पर कहते है । त्रैलोक्यरूपी रत्नों की कोश के समान अपने उदर में रक्षा करनेवाले, सब जीवों के पालक, तीनों लोकों का पालन करनेवाले इन्द्र, मनु, शेषनाग आदि के आधारभूत भगवान श्रीहरि जिसके पालक थे। जिसका नाम सुनने से एेरावत के गण्डस्थल मयूर के शब्द से साँपों के हृदय शिराओं की तरह सूख जाते थे ओर भय से स्वेदयुक्त, हो जाते थे । करुद्ध आकृतिवाले जिस बलि के प्रताप की दुःसह गर्मी से सातां महासागर शोष को प्राप्त होकर प्रलयकाल की तरह केवल गर्त संख्या से ही सात रहे, जलादि प्रवाह से सात नहीं रहे यानी सभी सूख गये । जिसके अश्वमेघ आदि श्रेष्ठ यज्ञो के धुएँ से उत्पन्न हुई मेघपंक्तियाँ जलग्रहण के लिए समुद्र को घेरी हुई अतएव इस ब्रह्माण्डरूपी कोटर की कवच बन गई । जिसके तिरछे देखने से जिनके आधारभूत कुलाचल विचलित हो उठते थे, ऐसी सब दिशाएँ फलभार से नमित हुई लताओं के समान झुकने लगती हैं । लीला से जिसने सब भुवनं के भूषणभूत इन्द्र आदि पर भी विजय प्राप्त की थी, ऐसे उस दैत्यराज ने दस करोड वर्ष तक राज्य किया । तदनन्तर जल के भवर के समान घूमनेवाले बहुत से युगो के बीतने पर, सुर- असुरो के बड़े भारी समूह के उन्नत ओर अवनत होने पर एवं त्रैलोक्य में अत्यन्त उत्कृष्ट बहुत से भोगों के निरन्तर भोगे जाने पर दानव राजा बलि को विषय भोग विरस प्रतीत होने लगे । मेरु पर्वत के शिखरपर रत्ननिर्मित घर के झरोखे पर बैठे हुए उसने एक बार संसार स्थिति का स्वयं विचार किया । अकुण्ठित शक्तिवाले मुझे अब इस लोक में कितने समय तक यह साम्प्रज्य करना होगा ओर तीनों लोकों मे विहार करना होगा ? तीनों लोकों को आश्चर्य मेँ डालनेवाले, प्रचुर भोगों से अत्यन्त मनोहर इस महान राष्ट के उपभोग से मेरा क्या प्रयोजन हैं ? अविचारमात्र से मधुर लगनेवाला और अवश्य विनष्ट होनेवाला यह सम्पूर्ण भोग मेरे लिए क्या सुखावह होगा ?