Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 7–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, verses 7–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 7-12
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
श्रृणु राघव ते वक्ष्ये बलेर्वृत्तान्तमुत्तमम् ।
श्रुतेन येन तं तत्त्वबोधं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ७ ॥
अस्त्यस्मिञ्जगतः कोशे कस्मिंश्चिद्दिङ्निकुञ्जके ।
पातालमिति विख्यातो लोको भूमेरधः स्थितः ॥ ८ ॥
क्षीरोदार्णवजाताभिर्दिरधाभिरमृतांशुभिः ।
क्वचिद्दानवकन्याभिर्भाति निर्विवरान्तरः ॥ ९ ॥
जिह्वागणोद्दामरवैर्विलोलरसनायुगैः ।
क्वचिद्भोगिभिरापूर्णः सहस्रशतमस्तकैः ॥ १० ॥
देहाद्रिवलिताशेषविश्वोद्धरणघस्मरैः ।
क्वचिद्दनुसुतैर्व्याप्तश्चलद्भिरिव मेरुभिः ॥ ११ ॥
कुम्भकूटाग्रविश्रान्तवसुधामण्डलोदरैः ।
क्वचिद्दिग्दन्तिभिर्दन्तद्रुमाद्रिभिरुपाश्रितः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, मैं आपसे बलि का उत्तम वृत्तान्त कहूँगा, आप उसे सुनिये ।
जिसके श्रवण से आप नित्य, तत्त्वरूप आत्मस्वरूप बोध को प्राप्त हो जायेंगे । इस ब्रह्माण्ड में किसी
दिग्रूप छोटे निकुंज में भूमि के नीचे विद्यमान पाताल नाम से प्रसिद्ध लोक है । कहीं पर वह क्षीरसागर
में उत्पन्न हुई अतएव वहाँ उत्पन्न अमृत के द्रव से मानों लिप्त अतिसुन्दरी दानव कन्याओं से ठसाठस
भरा हे । कहीं पर वह दो से लेकर दो हजार तक संख्यावाली जिह्ाओं से औरों की अपेक्षा व्याकरण,
छन्दःशास्त्र आदि का दुगुना व्याख्यान करने से तेज शब्दवाले अतएव चंचल जिह्ना से युक्त हजारों
सिरवाले साँपों से भरा है । कहीं पर अपने शरीररूपी पर्वत से सारे संसार को व्याप्त करनेवाले और धर्म
या यज्ञ के हविष्य को जवर्दस्ती छीन कर खानेवाले दानवो से वह आच्छन्न है, जो चल रहे मेरु पर्वत के
समान विशालकाय हैं । कहीं पर जिनके मस्तकरूपी शिखर की चोटियों पर भूमण्डल का मध्यभाग
विश्रान्त है और जो दाँतरूपी वृक्षों के पर्वत के तुल्य आश्रयभूत हैं, ऐसे दिग्गजों न उसको अपना
निवास स्थान बनाया है