Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 6
पाँचवाँ सर्ग समाप्त छठा सर्ग॑ शुक्राचार्य का मन से स्वर्ग मेँ गमन वहाँ पर इन्द्र का उन्हें सम्मान के साथ अपने समीप में बैठाना ।
24 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वहाँ पर नेत्र बन्द करके मन से उसी अप्सरा का ध…
- Verse 2यह आकाशमें मेरे आगे आगे जा रही अप्सरा इन्द्रलोक जाती है इसका अनुगमन कर रहा यह मैं स्वर्ग…
- Verse 3कोमल मन्दार के फूलों की शिरोमालाओं ओर कर्णफूलों से विभूषित ये देवता हैं, इनके शरीर बह रहे…
- Verse 4प्रत्यक्ष देखे गये नीलकमल के तुल्य जिनकी दृष्टियाँ है, मनोहर हास से विभूषित लतारहित शावाक…
- Verse 5फूलों से बनाई गई मालाओं से जगमगा रहे, परस्पर एक दूसरे मेँ प्रतिबिम्बित अतएव विश्वरूप सर्व…
- Verse 6ऐरावत के कपोलों के मदजल की अतिसुगन्धि में भी आसक्तिरहित हुए (मदजल तक का त्याग करके) भँवरो…
- Verse 7यह मन्दाकिनी है, इसके स्वर्णमय कमलों पर ब्रह्माजी के हंस ओर सारस घूम रहे हैं, तीर के उद्य…
- Verse 8ये यम, चन्द्र, इन्द्र, सूर्य, अग्नि, जल ओर वायु लोकपाल हैं, इन्होंने अपने शरीर की कान्ति…
- Verse 9युद्धो में शस्त्रास्त्रों के प्रहारों से जिसका मुंह खुजलाया गया है ऐसा यह ऐरावत है, इसने…
- Verse 10ये भूतल से आकाशमें तारे रूप बने हुए विमान से चलनेवाले सिद्ध लोग हे, जिनके शरीर ओर विमान क…
- Verse 11मेरूपर्वत के पत्थरों पर टकराने के कारण जल बिंदुओं से देवताओं को भर दिया है
- Verse 12ये इन्द्र के नन्दनवन की वीथियाँ हैं, गिरी हुई मन्दारमंजरी के गुच्छं से ये पीली हो गई हैं…
- Verse 13चन्द्रमा की किरणों की नाई आनन्द देनेवाले शीतलता ओर मन्दता आदि से युक्त, कुन्द ओर मन्दार क…
- Verse 14फूलों, केसरो ओर हिम तथा मकरन्द के कणों ओर वस्त्रों को सुगन्धित करनेवाले परागं से जो एक दू…
- Verse 15सुन्दर गान की ध्वनि से आनन्दपूर्वक देवांगनाओं को नचानेवाले वीणा के समान मधुर स्वरवाले ये…
- Verse 16ये अनेक पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो विविध भूषणो से विभूषित होकर आकाश में उड़ रहे विमानों में…
- Verse 17मद से उत्पन्न कामदेव से मत्त अंगवाली ये देवांगनाएँ जैसे वनलताएँ वन की सेवा करती हैं वैसे…
- Verse 18इन्द्रनील मणियाँ ही जिनके फूल हैं, चिन्तामणिर्यो जिनके कलियों के गुच्छे हैं तथा पके हुए फ…
- Verse 19यहाँ पर सिंहासन पर विराजमान इन देवराज इन्द्र को, जो दूसरे त्रिलोकी स्रष्टा के (ब्रह्मा के…
- Verse 20यह सोचकर उन शुक्राचार्य ने मन से ही शचीपति इन्द्र को आकाश में स्थित दूसरे महर्षि भृगु के…
- Verse 21तदुपरान्त इन्द्र ने सिंहासन से उठकर शुक्राचार्य का आदसपूर्वक पूजन किया । उनका हाथ पकड़कर…
- Verse 22हे श्रीशुक्राचार्य, यह स्वर्ग आपके शुभागमन से धन्य होकर सुशोभित हो रहा है, हे प्रभो, आप च…
- Verse 23तदुपरान्त सुन्दर मुखकमलवाले श्री शुक्राचार्यजी ने वहाँ पर बैठकर सोलहों कलाओं से युक्त निर…
- Verse 24सब देववृन्दों से अभिवन्दित एवं देवराज इन्द्र के समीप में बैठे हुए श्री शुक्राचार्य को चिर…