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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 4

तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्ग इन्द्रिय युक्त मन ही जगत की स्थिति का मूल है, उसका समूल उच्छेद होने पर दृश्य का असंभव देखने से जगत शून्य हो जाता है, यह कथन ।

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  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इन्द्रियसमूह के ऊपर विजयप्राप्तिरूपी पुल से संस…
  2. Verse 2इन्द्रियों पर विजय पाने के लिए विवेक श्रेष्ठ उपाय है । विवेक की प्राप्ति में एकमात्र सज्ज…
  3. Verse 3किये गये इन्द्रिय विजय का प्रकृत में सम्बन्ध कहने के लिए पूर्वोक्त पदार्थ का पुनः स्मरण क…
  4. Verse 4इस विषय में बहुत कहने से क्या मतलब है, मन ही कर्मरूपी वृक्ष का अंकुर है। मन के नष्ट होने…
  5. Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, यह सारा जगत मन ही है। मन का प्रतीकार होने पर सब जगजंजालरूपी रोग का प्…
  6. Verse 6यदि कोई शंका करे कि मन की चिकित्सा होने पर भी देहाधीन युख और दुःख होंगे ही ? उस पर कहते ह…
  7. Verse 7तो मन की चिकित्सा के लिए कौन औषधि उपयुक्त है, ऐसी शंका होने पर कहते हैं । दृश्य की अत्यन्…
  8. Verse 8यदि कोई शंका करे कि मनरूपी रोग आशभ्यंतर है, दृश्य तो बाह्य है ऐसी अवस्था में बाह्य पदार्थ…
  9. Verse 9बाह्य दृश्य का अत्यन्त अभाव मनकी चिकित्सा में कैसे उपाय होता है, इसे कहते हैं । मन की आभ्…
  10. Verse 10यह कैसे प्रतीत हुआ ? ऐसा प्रश्न होने पर अन्वय-व्यतिरेक से हमने यह जाना है, यह कहते हैं। ज…
  11. Verse 11और विचार करने पर जगत मन का धर्म ही है, इसलिए धर्मी मन के निवृत्त होने पर वह रह नहीं सकता…
  12. Verses 12–14जैसे तिलों में तेल रहता हैं अथवा जैसे गुणी में गुण रहता है या जैसे धर्मी में धर्म रहता है…
  13. Verse 15मन ही सम्पूर्ण जगत है ओर सम्पूर्ण जगत ही मन हे । वे दोनों सदा ही परस्पर अविनाभूत हैँ । उन…