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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

मनो जगज्जगदखिलं तथा मनः परस्परं त्वविरहिते सदैव हि । तयोर्द्वयोर्मनसि निरन्तरं क्षिते क्षितं जगन्नतु जगति क्षिते मनः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

मन ही सम्पूर्ण जगत है ओर सम्पूर्ण जगत ही मन हे । वे दोनों सदा ही परस्पर अविनाभूत हैँ । उन दोनों में से मन के अत्यन्त नष्ट होने पर जगत नष्ट हो जाता है, पर जगत के नष्ट होने पर मन नष्ट नहीं होता है