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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

स्फुरतीदं जगत्सर्वं चित्ते मननमूर्च्छिते । शून्यमेवाम्बरे स्फारे गन्धर्वाणां पुरं यथा ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

यह कैसे प्रतीत हुआ ? ऐसा प्रश्न होने पर अन्वय-व्यतिरेक से हमने यह जाना है, यह कहते हैं। जैसे विशाल आकाश में शून्य ही (असत्‌ ही) गन्धर्वो का नगर स्फुरित होता है, वैसे ही विषयों के चिन्तन से वृद्धि को प्राप्त मन में यह सम्पूर्ण संसार स्फुरित होता हे