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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

तदेतज्जायते लोके मनोमननमाकुलम् । मनसो व्यतिरेकेण देहः क्व किल दृश्यते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि मन की चिकित्सा होने पर भी देहाधीन युख और दुःख होंगे ही ? उस पर कहते हैं। जैसे मन का मननरूप ही स्वप्न कार्य में समर्थ होता है वैसे ही मन का देह के आकार से मननरूप ही देह, जो कि कार्य करने में समर्थ है, उत्पन्न होती है, भला बताइये तो सही, मन से भिन्नरूप से देह कहाँ दिखाई देती है 2