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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

मनो मोहमुपादत्ते म्रियते जायते मनः । तत्स्वचिन्ताप्रसादेन बध्यते मुच्यते पुनः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्य दृश्य का अत्यन्त अभाव मनकी चिकित्सा में कैसे उपाय होता है, इसे कहते हैं । मन की आभ्यन्तरता और पदार्थो की बाह्मता वास्तविक नहीं है, किन्तु मन ही द्वैविध्यआदि की कल्पना द्वारा मोह को प्राप्त होता है, मरता है, उत्पन्न होता है यानी जन्म, मृत्यु, बन्ध, मोक्ष आदि की कल्पना करता है, अर्थात्‌ विषयचिन्तन के प्रभाव से बन्धन में पड़ता है और आत्मतत्त्व के विचार के प्रताप से मुक्त होता है