Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verses 12–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
यथा तिलकणे तैलं गुणो गुणिनि वा यथा ।
यथा धर्मिणि वा धर्मस्तथेदं चित्तके जगत् ॥ १२ ॥
रश्मिजालं यथा सूर्ये यथालोकस्तु तेजसि ।
यथौष्ण्यं चित्रभानौ च मनसीदं तथा जगत् ॥ १३ ॥
शैत्यं यथैव तुहिने यथा नभसि शून्यता ।
यथा चञ्चलता वायौ मनसीदं तथा जगत् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तिलों में तेल रहता हैं अथवा जैसे गुणी में गुण रहता है या
जैसे धर्मी में धर्म रहता है वैसे ही यह जगत चित्त में स्थित है। जैसे सूर्य में किरणों का समूह है, जैसे तेज
में प्रकाश है और जैसे अग्नि में उष्णता है वैसे ही मन में यह जगत है । जैसे बरफ में ठण्डक है, जैसे
आकाश में शून्यता है और जैसे वायु में चंचलता है वैसे ही मन में यह जगत है