Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 20
उन्नीसर्वौँ सर्ग समाप्त बीसवाँ सर्ग संसार सत्य आत्मा का अवलम्बन न करनेवाली चित्त की भ्रान्ति है, सत्य आत्मा का अवलम्बन करने पर तो चित्त और संसार आत्मा ही है, यह वर्णन ।
9 verse-groups
- Verse 1पू्ववर्णित जाग्रदादिस्वरूप कथन का प्राकृत में सम्बन्ध दिखलाते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा :…
- Verse 2इस वर्णन से मन का कैसा स्वभाव ज्ञात हुआ, यदि यह कोई शंका करे, तो दृढरूप से भावित पदार्थ क…
- Verse 3इससे सत् ओर असतूरूप हेय ओर उपादेय प्रतीति के विषय सभी पदार्थ एकमात्र मन से कल्पित होने क…
- Verse 4व्यष्टिरूप से मन भ्रान्तिजनक है ओर समष्टिरूप से भान्ति के विषय जगत का उपादान है, ऐसा भेद…
- Verse 5यदि कर्ता-अंश शुभ मार्ग में लगाया जाय, तो उपादानाश मे स्थित अणिमा आदि विभूतियाँ और तत्त्व…
- Verse 6यदि कोई कहे कि देह ही पुरुष हो, मन पुरुष न हो, तो इस पर कहते हैं। यदि शरीर पुरुष होता, तो…
- Verse 7इसलिए शरीर पुरुष नहीं हो सकता, घड़े, दीवार आदि के तुल्य वह वेत्य ही है; ऐसा कहते हैं। इसल…
- Verse 8मन सब पदार्थो की प्राप्ति में समर्थ हो, उससे मेरा क्या काम ? ऐसी यदि शंका हो, तो उस पर कह…
- Verse 9पहले कहे गये अर्थ का ही संक्षेप कर उपसंहार करते हैं। मन के इच्छित स्थान या विषय को शरीर प…