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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 20, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 20, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

दृढनिश्चयवच्चेतो यद्भावयति भूरिशः । तत्तां यात्यनलाश्लेषादयःपिण्डोऽग्नितामिव ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इस वर्णन से मन का कैसा स्वभाव ज्ञात हुआ, यदि यह कोई शंका करे, तो दृढरूप से भावित पदार्थ के आकार को धारण करना ही मन का स्वभाव है, ऐसा कहते है। जैसे अग्नि के सम्बन्ध से लोहे का गोला आग बन जाता हे, वैसे ही दृढ निश्चयवाला चित्त जिस वस्तु की बार-बार भावना करता है उसी के आकार को प्राप्त हो जाता है