Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 20, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 20, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अतश्चित्तं हि पुरुषः शरीरं चेत्यमेव हि ।
यन्मयं च भवत्येतत्तदवाप्नोत्यसंशयम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए शरीर पुरुष नहीं हो सकता, घड़े, दीवार आदि के तुल्य वह वेत्य ही है; ऐसा कहते हैं।
इसलिए चित्त ही पुरुष है, शरीर तो विषय है। चित्त जिसकी भावना करता है, उसको निश्चय ही
प्राप्त होता है