Guru's AddaGuru's Adda

Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 12

ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग समुद्र और तरंग के दृष्टान्त से प्राप्त हुई आत्माविकारिता के वारणपूर्वक मोह से उत्पन्न हुई विचित्रता की विवर्तरूपता का वर्णन ।

11 verse-groups

  1. Verse 1पहले सब जीवों की ब्रह्मैकता और भेदक प्रपंच की असत्यता का उपपादन करने के लिए कहते हैं । का…
  2. Verses 2–3यदि उससे अभिन्न हैं, तो क्यो वैसा (हम अभिन्न हैं यों) अनुभव नहीं करते ? इस पर कहते हैं। ह…
  3. Verse 4जो ये ब्रह्मसंविद्रूपी जीव हैं, वे एकमात्र देहात्मभाव के पुन: पुनः अनुसन्धान से कलंकित है…
  4. Verses 5–7हे मुनिजी, संकल्परूपी इस कल्पना से ही, जो कराल विविध कर्मरूपी कजं के बीजों की मुट्ठी के त…
  5. Verses 8–9इनमें से कोई ये जीव अत्यन्त निर्मल हैं, जैसे कि विष्णु, हर आदि | कोई ज्ञानाधिकार की योग्य…
  6. Verse 10कुछ जीव शास्त्रप्रतिकूल प्रवृत्ति से ब्रह्मरूपी महासागर के यानी मुक्ति से दूर बहाये जाते…
  7. Verse 11को प्राप्त हुए कुछ जीव संसार में आने से उत्पन्न हुए परिश्रम की विश्रान्ति में हेतुभूत योग…
  8. Verse 12कुछ विष्णु, ब्रह्मा, हर आदि जीव ब्रह्मतत्त्वरूप महोदधि से कुछ भेदक विशुद्ध ज्ञानोपाधि को…
  9. Verse 13अल्पमोहवाले कोई जीव, जिसकी सीमा नहीं है ऐसी पूर्णतावाले, उसी ब्रह्मरूपी महासमुद्र का समाध…
  10. Verses 14–15कुछ जीव, अवश्य भोगने योग्य जन्मसमूहों से जिन्होंने करोड़ों जन्मों का भोग कर लिया है फिर भ…
  11. Verse 16बहुत प्रकार के सुख-दुःख देनेवाले जन्मों की आकाररूप, ज्ञान के बिना कभी क्षीण न होनेवाली यह…