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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 12, Verses 5–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 12, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

संकल्परूपयैवान्तर्मुने कलनयैतया । कर्मजालकरञ्जानां बीजमुष्ट्या करालया ॥ ५ ॥ इमा जगति विस्तीर्णाः शरीरोपलपङ्क्तयः । तिष्ठन्ति परिवल्गन्ति रुदन्ति च हसन्ति च ॥ ६ ॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं स्पन्दनैः पवनो यथा । उल्लसन्ति निलीयन्ते म्लायन्ति विहसन्ति च ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुनिजी, संकल्परूपी इस कल्पना से ही, जो कराल विविध कर्मरूपी कजं के बीजों की मुट्ठी के तुल्य है, जगत में विस्तीर्ण हुई ये शरीररूपी लताओं की पंक्तियाँ स्थित हैं, इधर-उधर चलती-फिरती है, रोती ओर हँसती हैं । जैसे वायु अपने स्पंदनों द्वारा उल्लास को प्राप्त होती है और लीन हो जाती है, वैसे ब्रह्मा से लेकर वृक्षपर्यन्त ये शरीर पंक्तियाँ भी उल्लास को प्राप्त होती हैँ, तिरोहित हो जाती हैं, म्लान हो जाती हैं ओर हँसती हैं