Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
यत्राहमपि रक्षामि राक्षसी गुणशालिनम् ।
तत्रान्यः को न कुर्यात्तं हृदि हारमिवामलम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जब राक्षसी होकर भी मैं गुणवान् की रक्षा करती हूँ, तब अन्य कौन पुरुष गुणवान् पुरूष को
गले का निर्मल हार नहीं बनायेगा