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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

अपश्यतः स्वमात्मानं मृतिर्मूढस्य जीवितम् । मरणेनोदयोऽस्यास्ति पापासंपत्तिहेतुतः ॥ २१ ॥ आदिसर्गे च नियमः कृतः पङ्कजजन्मना । हिंस्राणां भोजनायास्तु मूढात्मानात्मवानिति ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने यथार्थ स्वरूप को न देख रहे मूढ का मरण ही जीवन है यानी जीवन से मरण अच्छा है । मरण से इस मूढ का अभ्युदय होता है, क्योकि उसे पाप की प्राप्ति नहीं होती । ब्रह्मा ने सृष्टि के आदि में यह नियम कर रक्खा है कि अनात्मज्ञ मूढ पुरुष घातक पशुओं का भोजन हो