Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इहामुत्र च नाशाय मूढो दुःखाय जीवति ।
यत्नाद्विनाशनीयोऽसौ नानर्थः परिपाल्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अनात्मज्ञ पुरुष इस लोक में ओर परलोक मेँ विनाश और दुःख के लिए जीवन धारण
करता है । इसलिए मूढ का यत्नपूर्वक विनाश कर देना चाहिए । अनर्थका परिपालन करना
उचित नहीं हे