Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verses 1–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, verses 1–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 1-11
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतस्मिन्नन्तरे तत्र किरातजनमण्डले ।
हस्तहार्यतमःपिण्डा बभूवासितयामिनी ॥ १ ॥
नीलमेघपटच्छन्ना निरिन्दुगगनान्तरा ।
तमालवनसंपिण्डा मांसलोड्डीनकज्जला ॥ २ ॥
लताघनतया ग्रामकोटरैकान्ध्यमन्थरा ।
गृहचत्वरसंबाधे नगरे नवयौवना ॥ ३ ॥
चत्वरेषु तमःपिण्डी प्रजिह्मीकृतदीपिका ।
कुञ्चितच्छिद्रनिष्क्रान्ताऽऽदीपिकारोचिराजिता ॥ ४ ॥
सुवयस्येव कर्कट्याः परिनृत्यत्पिशाचिका ।
मत्तवेतालकङ्कालकाष्ठमौनमिवास्थिता ॥ ५ ॥
सुषुप्तमृगभूतौघघननीहारहारिणी ।
मन्दमन्दमरुत्स्पर्शलसत्प्रालेयसीकरा ॥ ६ ॥
सरःसु विवटद्वारि काकभेकतरङ्गिता ।
अन्तःपुरेषु रमणरणन्नारीनरानना ॥ ७ ॥
जङ्गलेषु जगज्वाला जटालज्वलनोज्ज्वला ।
केदारेष्वम्बुसंसेकपृष्ठपाकमिलच्छला ॥ ८ ॥
नभस्थलेक्षितस्पन्दप्रविविक्तर्क्षचक्रिका ।
वनेषु विसरद्वातपतत्पुष्पफलद्रुमा ॥ ९ ॥
श्वभ्रेषु कौशिकस्यान्तर्वायसव्याहतारवा ।
तस्कराक्रान्तपर्यन्तग्राम्याक्रन्दनकर्कशा ॥ १० ॥
विपिने विपिनामौना नगरे सुप्तनागरा ।
वनेषु विसरद्वाता नीडेष्वस्पन्दपक्षिका ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस बीचमें, जब कि वह किरातों के देश में गई,
अत्यन्त अँधेरी रात्रि थी, उसका पिण्ड के तुल्य घनीभूत अन्धकार हाथ से पकड़ा जा सकता
था, (वह रात्रि क्या थी, कर्कटीकी सखी थी) नीले मेघरूपी वरन्रों से वह आच्छादित थी,
अमृत को कोई लूट न ले, इस भय से उसके आकाश से चन्द्रमा भाग गया था, तमालो के
घनीभूत वनों को वह मानों एकत्रित कर रही थी, अतएव अत्यन्त पुष्ट थी, उसके नेत्रका
काजल चारों ओर उड़ता और काला कर देता था, पर्वत के गाँवों में लताएँ अति निबिड थी,
अतः तारों की ज्योतिका भी प्रवेश नहीं होता था, अतएव अत्यधिक अन्धकार होने के कारण
बुढ़िया के समान वह मन्दगति थी, घरों के आँगनोंसे अत्यन्त घने नगर में नवयुवती नायिका
के समान दीपिकाओं से इधर उधर संचार करती थी, आँगनों में वायु द्वारा उसने दीपको को
टेढा कर दिया था, वह पिण्डीभूत अन्धकार के तुल्य थी, झरोखों के टेढे छिद्रों से निकली हुई
छोटी दीपरश्मियों से वह शोभित हो रही थी, वह कर्कटीकी सखी सी थी, उसमें पिशाच नाच
रहे थे, मदोन्मत्त वेतालो को नरकंकालों की लूट से वह रोकती नहीं थी, अतएव प्रतीत होता
था कि मानों उसने काष्ठ के समान मौन धारण कर रक्खा है, सोये हुए मृग आदि प्राणियों से
ओर निबिड कुहरे से वह अलंकृत थी, उसमें मन्द मन्द वायु के स्पर्श से ओस के कण भले
मालूम पड रहे थे । तालाबों में बड़े-बड़े गर्तो के मुँह पर वह कौओं ओर मेढकों से व्याप्त थी,
उसमें अन्तःपुरो में क्रीडा के समय स्त्रीपुरुषों के मुख परस्पर आलाप कर रहे थे, जंगलों में
प्रलयकालीन अग्नि की तरह ज्वालायुक्त वनाग्नि से वह चमक रही थी, उक्त रात्रि में खेतों में
जल के सेक से अनेकों साही के पर घुस रहे थे, जो कि पुराने हो जाने के कारण उनकी पीठ से
गिर गये थे । आकाश में आँखों के तुल्य प्रतीत हो रहे ओर स्पन्द व्यापारसे अलग-अलग हुए
सैंकड़ों नक्षत्र उसमें व्याप्त थे, वनों में तेज बह रहे वायु से उसमें फूल, फल ओर वृक्ष गिर रहे
थे और वृक्षों के खोखलों के अन्दर उल्लुओं का शब्द सुनकर उसमें कौओं की बोली बन्द हो
गई थी, तस्करो द्वारा चारों ओर धिर गये ग्रामीण लोगों के रोदन से वह अति भीषण मालूम
पडती थी, जंगल में वह जंगल के समान स्तब्ध थी और नगर में सब नागरिक उसमें सोये हुए
थे। वनों में खूब वायु बह रही थी और घोंसलों में पक्षी निर्व्यापार होकर सोये थे
सर्ग सन्दर्भ
छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सतहत्तरवाँ सर्ग पहले रात्रि का वर्णन, तदनन्तर कर्कटी को राजा और मन्त्री का दर्शन और उनसे कर्कटी की प्रश्न करने की इच्छा का विस्तार से वर्णन ।