Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verses 16–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, verses 16–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 16-19
संस्कृत श्लोक
तस्यां रजन्यां भीमायां किरातजनमण्डले ।
मन्त्रिणा सह भूपालस्तस्मिन्नवसरे तदा ॥ १६ ॥
निर्जगाम सुधीरात्मा नगरात्सुप्तनागरात् ।
अटवीं विक्रमो नाम विषमां वीरचर्यया ॥ १७ ॥
अटव्यां कर्कटी सा तौ चरन्तौ राजमन्त्रिणौ ।
अपश्यद्धृतधैर्यास्त्रौ वेतालालोकनोन्मुखौ ॥ १८ ॥
अथ सा चिन्तयामास लब्धो भक्षो ह्यहो मया ।
मूढावेतावनात्मज्ञौ भारो देहः किलानयोः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय यानी उस भीषण रात्रि में किरातो के नगर का विक्रम नामक राजा, जो बड़ा धैर्यवान्
था, अपने नगर से, जिसमें सब नागरिक सो गए थे, मन्त्री के साथ बाहर निकला । वह वीरोचित
रात्रि-चयसि दस्यु आदि के वध के लिए भीषण जंगल में गया । उस कर्कटीने जंगल में घूमते
हुए उन राजा ओर मन्त्रीको, देखा जिन्होंने केवल धैर्यरूपी अस्त्र धारण कर रक्खा था ओर जो
ग्राम से बाहर स्थित ग्राम के देवता वेताल के दर्शन के लिए उत्सुक थे । उनको देखकर उसने
विचार किया : “बड़े हर्ष की बात है कि आज मुझे भोजन मिल गया है, ये दोनों मूढ अतएव
अनात्मज्ञ हैं, इन दोनों का शरीर पृथ्वीका भाररूप हे