Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 74
तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त चौहत्तरवाँ सर्ग उस तपस्विनी सूची को देखकर वायु का इन्द्र के समीप मेँ जाना, सूची को वर देने के लिए ब्रह्मा से इन्द्र की प्रार्थना और सूची के ज्ञान का वर्णन ।
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- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जिसमें पूर्ववर्णित महान् वन था, उस उन्नत शिखर की उस भूम…
- Verses 3–5एक बार खुले हुए मुख से धूप और वायु का ग्रहण कर ये मेरे अन्दर नहीं समा रहे हैं, यह दर्शाती…
- Verse 6वह पूर्वोक्त महाअरण्य द्वारा वृक्ष, लता, झाड़ियाँ, मृग आदि अपने विभवरूप पदार्थों को अन्य…
- Verse 7यहाँ पर सूची की, तप के उपक्रम में अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण, उस्र महान् वन की शिखा के…
- Verses 8–9महातपस्विनी सूची किसलिए तपश्चर्या करती है, यह पूछने का उसको साहस नहीं हुआ, क्योंकि वह उसक…
- Verses 10–11मेघमार्ग को लाँधकर और उन चास वायुओं के स्तरों का अतिक्रमण कर सिद्धों को अपने से नीचे करके…
- Verse 12इन्द्र के पूछने पर वायु ने देववृन्द से परिवृत्त और सभामें बैठे हुए इन्द्र से कहा : जिस का…
- Verses 13–15हे महेन्द्र, जम्बूद्वीप में अत्यन्त उन्नत हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसके साक्षात् भगव…
- Verse 16उसने शीत और वायु के निगलने की निवृत्ति के लिए मुख को, जिसके अत्यन्त छोटे छिद्र के संकोच क…
- Verses 17–18उसकी घोर तपस्या से हिमालय अपनी हिममयता का त्यागकर अग्निमय लोहपिण्ड बनकर दुःसेव्य हो गया ह…
- Verse 19इस प्रकार वायु के अनुरोध से इन्द्र देवताओं के साथ ब्रह्मलोक में गये, वहाँ जाकर उन्होने भग…
- Verse 20मैं सूची को वर देने के लिए हिमालय के शिखर में जाता हूँ, यों ब्रह्माजी के आश्वासन देनेपर इ…
- Verse 21इतने समय में (सात हजार वर्षो में) वह सूची अति पवित्र हो गई थी, उसने अपने तप के ताप से देव…
- Verse 22इस सर्ग की समाप्ति में सूची के तप का वर्णन कर रहे श्रीवस्रिष्ठजी निर्जन वन में किये गये स…
- Verse 23रेशम के तार के समान अत्यन्त सूक्ष्म सूचीने अपनी स्थिरता से मेरू को भी जीत लिया, उसके द्वा…
- Verse 24तो मध्याह्न में क्यो वह उसके मूल में छिप जाती थी ? इस पर कहते हैं । अन्य समय में दूर से ग…
- Verse 25वह छाया सूची को देखती थी और बड़े तीक्ष्ण सूर्य के ताप से उसके अंगों मेँ मग्न हो जाती थी,…
- Verse 26उसने अपनी तपस्या से पवित्र हुए परस्पर के मध्यवर्ती त्रिकोणदेशको असी, वरणा और गंगा इन तीनो…
- Verse 27सूखने के कारण अदृश्य, श्यामा, शुक्ला-इन तीन वर्णोवाली सूचीरूपी सरिता से परिवेष्टित जो वहा…
- Verse 28हे राघव, प्रत्यगूज्ञान का स्वयं ही विचार करके जिसने परम कारण ब्रह्मका साक्षात्कार कर लिया…