Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
मुखरन्ध्रस्थितार्कांशुदृशा स्वच्छाययैव सा ।
विकासिन्या विवर्तिस्था चोदितान्तमवेक्षिता ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस सर्ग की समाप्ति में सूची के तप का वर्णन कर रहे श्रीवस्रिष्ठजी निर्जन वन में किये गये
सूची के तप की केवल उसकी छाया ही साक्षिणी थी, ऐसा कहते हैं।
अत्यन्त बढ़ रही तपस्या में स्थित उस सूची को उसकी छायाने, विकास को प्राप्त हुई
मुखरन्ध्र में प्रविष्ट सूर्यकिरणरूपी दृष्टि से, तव तक देखा जब तक तपस्या करनेका उसने
संकल्प किया था