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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

तस्यास्तीव्रेण तपसा तुहिनाकरमुत्सृजन् । अग्न्याकारमयो गृह्णन् देव दुःसेव्यतां गतः ॥ १७ ॥ तदुत्तिष्ठाशु गच्छामः सर्व एव पितामहम् । तद्वरार्थमनर्थाय विद्धि तत्सुमहत्तपः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी घोर तपस्या से हिमालय अपनी हिममयता का त्यागकर अग्निमय लोहपिण्ड बनकर दुःसेव्य हो गया है, इसलिए शीघ्र उठिए, हम सभी लोकपितामह ब्रह्माजी के पास उसके वरदान के लिए जायें, यह निश्चय समझिए कि यदि उसकी उपेक्षा की जायेगी तो उसका वह घोर तप लोगों के अनर्थ के लिए ही होगा