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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verses 3–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 3-5

संस्कृत श्लोक

सकृद्विकसितास्येन गृहीत्वेवातपानिलान् । पश्चात्त्यजन्तीं हृदये मे न मान्तीत्यनारतम् ॥ ३ ॥ शुष्कां चण्डांशुकिरणैर्जर्जरां वनवायुभिः । अचलन्तीनिजात्स्थानात्स्नापितामिन्दुरश्मिभिः ॥ ४ ॥ पूर्वं रजोणुनैकेन संविष्टच्छन्नमस्तकाम् । कृतार्थत्वं कथयतीं ददतान्यस्य नास्पदम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

एक बार खुले हुए मुख से धूप और वायु का ग्रहण कर ये मेरे अन्दर नहीं समा रहे हैं, यह दर्शाती हुई सी वह उनको बार बार बाहर निकाल रही थी, प्रचण्ड सूर्य की किरणों से वह सूख गई थी और वन के रक्ष वायुओं से उसका शरीर जर्जर हो गया था, अपने स्थान से वह विचलित नहीं होती थी और चन्द्रमा की किरणें उसे स्नान कराती थी । अन्य को स्थान न दे रहे एक रज:कण से उसका मस्तक आच्छन्न था, अतएव उसकी रज:कण से वह अपनी कृतार्थता को प्रकाशित कर रही थी, भाव यह है कि सूची के मस्तक पर दूसरे रज:कण का समावेश तो हो नहीं सकता था इसी कारण अन्य रजोजातीय रजोगुण को और उससे सहचरित तमोगुण को स्थान न दे रहे रजःपरमाणुरूप हेतु से वह अपनी कृतार्थता का अनुमान करा रही थी