Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 65
चौसठवाँ सर्ग समाप्त पैंसठवाँ सर्ग मन का, भोग्यसमुदायका और भोक्ता के मूल का तत्त्व चिन्मात्रशेष है, यह प्रदर्शन ।
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- Verses 1–2सम्पूर्ण कल्पनाएँ चित् से अतिरिक्त नहीं है, यह कहने के लिए मूलभूत मन की उत्पत्ति और स्थि…
- Verse 3मन ही जब भेददर्शन को कराता है तब मन के हट जानेपर केवल एक आत्मा के प्रतिष्ठित रहने से मन स…
- Verse 4भेद के नष्ट हो जानेपर अवशिष्ट आत्मस्वरूप को दिखलाते हैं। जिसके विस्तार का आर-पार नहीं है,…
- Verse 5चित् ओर जगत् का बाध होने पर कैसे सत् का परिशेष होता है ? ऐसी शंका कर जगत् स्थिर ओर अस…
- Verse 6यद्यपि जगत् अत्यन्त असत् है, तथापि उसका कभी बाध नहीं दिखाई दिया, ऐसी आशंका कर उसकी बाधय…
- Verse 7तब यह चिरकाल तक कैसे स्थिर रहता है 2 इस पर कहते हैं। जैसे भलीभाँति न देखने से स्थाणु में…
- Verse 8यदि को शंका करे कि आत्मा अपने परिपूर्णानन््दस्वभावसे च्युत करनेवाले तथा सम्पूर्ण दुःखो क…
- Verses 9–11चिदात्मा का विषयोन्मुखतारूप स्वभाव ही विविध अनर्थो की जड है, ऐसा कहते हैं । नामरहित, सम्प…
- Verse 12यह सारी-की सारी अनर्थपरम्परा जीव और ब्रह्म में भेदभ्रम से उत्पन्न हुई है, उन दोनों की एकत…
- Verse 13सम्पूर्ण शास्त्रों के विचाररहस्य को एक उक्ति से सक्षेपतः कहते है । वस्तुतः कर्म ही देह है…