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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

न सन्नासन्न संजातश्चेतसो जगतो भ्रमः । अथ धीसमवायानामिन्द्रजालमिवोत्थितः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि जगत्‌ अत्यन्त असत्‌ है, तथापि उसका कभी बाध नहीं दिखाई दिया, ऐसी आशंका कर उसकी बाधयोग्य अनिर्वचनीयता कहते हैं । जगत्‌ न तो सत्‌ है, न असत्‌ है ओर न उत्पन्न हुआ है, केवल चित्त का भ्रम है यानी मिथ्या है। शंका - यदि वह मिथ्या है, तो उसमें बहुतों को एकाकारता कैसे प्रतीत होती है ? समाधान - सामाजिकों को विविध बुद्धियों की एकाकारताभ्रम वैसे ही होता है, जैसे एेन्द्रजालिक की माया से क्षुब्ध हुए अनेक लोगों को इन्द्रजाल से बनी वस्तु में एकाकारता प्रतीति होती है