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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

अनात्मालोकनाच्चित्तं चित्तत्वं नानुशोचति । वेतालकल्पनाद्बाल इव संकल्पिते भये ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि को शंका करे कि आत्मा अपने परिपूर्णानन्‍्दस्वभावसे च्युत करनेवाले तथा सम्पूर्ण दुःखो के निदानभूत अपने मनोभाव का ही क्यों शोक नहीं करता ? जैसे बालक स्वयं वेताल की कल्पना कर उससे होनेवाले भय के भली भती मन में जम जाने पर भय से परिपूर्णचित्त होने के कारण भय की हेतुभूत वेताल की कल्पना पर शोक नहीं करता, वैसे ही आत्मविषयक अज्ञान तथा अनात्माओं के दर्शन से चित्तभाव को प्राप्त हुआ भी आत्मा चित्तभाव से प्राप्त हुए अनर्थो के लिए शोक नहीं करता