Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अपारावारविस्तारसंवित्सलिलवल्गनैः ।
चिदेकार्णव एवायं स्वयमात्मा विजृम्भते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
भेद के नष्ट हो जानेपर अवशिष्ट आत्मस्वरूप को दिखलाते हैं।
जिसके विस्तार का आर-पार नहीं है, इस प्रकार के संवित्रूपी जल के असीम प्रसारों से
चिदेकार्णव यह आत्मा स्वयं विजृम्भित (विकसित) होता है