Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verses 9–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
अनाख्यस्य स्वरूपस्य सर्वाशातिगतात्मनः ।
चेत्योन्मुखतया चित्तं चित्ताज्जीवत्वकल्पनम् ॥ ९ ॥
जीवत्वादप्यहंभावस्त्वहंभावाच्च चित्तता ।
चित्तत्वादिन्द्रियादित्वं ततो देहादिविभ्रमाः ॥ १० ॥
देहादिमोहतः स्वर्गनरकौ मोक्षबन्धने ।
बीजाङ्कुरवदारम्भसंरूढे देहकर्मणोः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदात्मा का विषयोन्मुखतारूप स्वभाव ही विविध अनर्थो की जड है, ऐसा कहते हैं ।
नामरहित, सम्पूर्णं दिशाओं को अतिक्रान्त करनेवाला यानी सर्वव्यापक आत्मा का
विषयोन्मुखतारूप स्वभाव होने से उससे चित्त की उत्पत्ति होती है, चित्तसे जीवत्व की
उत्पत्ति होती है, जीवत्व से अहंभाव की उत्पत्ति होती है, अहंभाव से चित्तता होती हे, चित्त
की विषय तन्मात्रा से इन्द्र्यो, उनसे देह आदि का भ्रम, देह आदि में (आत्मत्वभरम से)
“अहं मम” इस अभिमान से बीजांकुर के समान नानाकार्यपटु देह, कर्म; उनसे स्वर्ग ओर
नरक तथा बन्ध ओर मोक्ष होते हैं