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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

असत्यमस्थैर्यवशात्सत्यं संप्रतिभासतः । यथा स्वप्नस्तथा चित्तं जगत्सदसदात्मकम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्‌ ओर जगत्‌ का बाध होने पर कैसे सत्‌ का परिशेष होता है ? ऐसी शंका कर जगत्‌ स्थिर ओर अस्थिर इन दो अंशों से संयुक्त होने के कारण सत्‌ ओर असद्रूप है, अस्थिर अंश का बाध होने पर स्थिर अंश के परिशेष रहने मे कौन अनुपपत्ति है, इस आशय से कहतेहैँ। अस्थिर होने के कारण असत्य तथा अवभासित होने के कारण सत्य यह मनोमय जगत्‌ स्वप्न के समान सत्‌ ओर असद्रूप हे । जैसे स्वप्न के अस्थिर विषयांश का बाध होने पर स्थिर जो स्वप्नद्रष्टा है, उसका परिशेष दिखाई देता है, वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिए