Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 28
सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अड्ठाईसवाँ सर्ग दृष्ट प्रपंच के असत्य होने से चिदाकाश की सत्यता और पर्वत तथा गिरिग्राम का विस्तार से वर्णन।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, वज के समान दृढ पूर्वोक्त रीति से अनेक करोड़ योजन भलीभाँत…
- Verses 2–22श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, कहाँ ब्रह्माण्ड है, कहाँ उसकी दीवार है और कहा…
- Verses 23–33पर्वत का वर्णन कर पर्वतग्राम का वर्णन करते हैं। तदनन्तर उन दोनो ललनाओं ने उस समय वहीं स्व…
- Verses 34–42उस्र नगर में रहनेवाली भील आदि दरिद्रों की स्त्रियों का वर्णन करते हैं। उसमें दरिद्र, नीच…
- Verses 43–63एकान्त स्थान में सोये हुए बछड़े के एक कान के कम्पन से मक्खियाँ उड़ रही थी, गोपों (गौओं को…