Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, Verses 34–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, verses 34–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 34-42
संस्कृत श्लोक
क्षौमाग्रहस्ताम्बरया मञ्जरीपूर्णकर्णया ।
क्षुत्क्षीणयाक्रान्तरथ्यं ग्रामकीटककान्तया ॥ ३४ ॥
सरित्तरङ्गसंघट्टसंरावाश्रुतसंकथम् ।
कर्मजाड्यघनत्रासवाञ्छितैकान्तसंस्थितम् ॥ ३५ ॥
दधिलिप्तास्यहस्तांसैः स्निग्धपुष्पलताधरैः ।
नग्नैर्गोमयपङ्काङ्कैर्बालैराकुलचत्वरम् ॥ ३६ ॥
तीरशाद्वलवल्लीनां दोलान्दोलनकारिभिः ।
तरङ्गैर्वाह्यमानस्य लेखिकाङ्कितसैकतम् ॥ ३७ ॥
दधिक्षीरघनामोदमत्तमन्थरमक्षिकम् ।
कामभुक्तार्थतोद्वाष्पजर्जराबलबालकम् ॥ ३८ ॥
गोमयासिक्तवलयकरनारीकृतक्रुधम् ।
धम्मिल्लवलनाव्यग्रत्रस्तस्त्रीविहसज्जनम् ॥ ३९ ॥
दान्तपुष्पच्छदोत्सन्नपतत्ककुदवायसम् ।
गृहरथ्यागणद्वारकीर्णक्रूरकुरण्टकम् ॥ ४० ॥
गृहपार्श्वस्थितश्वभ्रकुञ्जैः कुसुमितप्रभैः ।
प्रत्यहं प्रातरागुल्फमाकीर्णकुसुमाजिरम् ॥ ४१ ॥
चरच्चमरसारङ्गजालजङ्गलखण्डकम् ।
गुञ्जानिकुञ्जसंजातशष्पसुप्तमृगार्भकम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
उस्र नगर में रहनेवाली भील आदि दरिद्रों की स्त्रियों का वर्णन करते हैं।
उसमें दरिद्र, नीच ओर आलसी लोगों की स्त्रियाँ अलसीकी शाखाओं को ही, सुलभ
होने के कारण, वस्त्ररूप में पहननेवाली, बौरों का कर्णफूल पहनी हुई एवं भूख और प्यास
से कृश होकर गलियों में घूमती थी । नदियों की लहरों के आपस में टकराने के शब्द से
लोगों का आलाप नहीं सुनाई पड़ता था, शिल्प आदि कार्य करने की दक्षता न होने के कारण
भयभीत मूर्ख ओर आलसी लोग एकान्त में बैठा रहना चाहते थे । दही से मुँह, हाथ और
कन्धों को पोते हुए, कोमल कोमल छोटी लताओं को लिये हुए, गोबर और कीचड़ में सने
हुए बालकों से उक्त नगर के चौतरे भरे थे । उसमें बालूमय तटभूमि नदी के तटवर्ती सिवार
की लताओं को झूले के समान हिलनेवाले तरंगों से बहाये जाते हुए जल की रेखाओं से अंकित
थी। उसमें दही और दूध की घन सुगन्ध से उन्मत्त होकर मक्खियाँ मन्थरगति थी और अपनी
इच्छित वस्तु खाने के लिए रो रहे बेचारे पराधीन बालकों का मुँह आँसुओं की धाराओं से
जर्जरित हो रहा था । दासियों के हाथ के कंकण गोबर से सने हुए थे, अतएव उनपर गुस्सा
होकर खुले हुए केशों को बोधने में लगी हुई स्त्रियों को देखकर लोग उनकी हँसी कर रहे थे ।
उसमें पहाड़ी कौए शान्त मुनियों द्वारा डंडे और ढेले आदि से उड़ाने से कहीं उन्हें चोट न
लग जाय इस कारण फूलों अथवा पत्तों द्वारा उड़ाये जानेपर भी पूजा के अक्षत खाने के
लिए फिर फिर उड़ रहे थे । घरों और गलियों के दरवाजों पर उसमें कठिन पीली कटैया के
पेड़ बखेरे थे। घर के समीप के गर्तो को कुंजों से, जो प्रफुल्लित ओर शोभायमान थी, प्रतिदिन
प्रातःकाल टखनों तक आँगनों में फूल बरसाये गये थे उसके जंगल घास चर रहे भाँति-
भाँति के मृग और पक्षियों से पूर्ण थे, गुंजाफल के निकुंजों में जमे हुए घास के हरे हरे तिनकों
में मृगों के बच्चे सोये थे (५६)