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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, Verses 2–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, verses 2–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 2-22

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । क्व ब्रह्माण्डं क्व तद्भित्तिः क्वात्रासौ वज्रसारता । किलावश्यं स्थिते देव्यावन्तःपुरवराम्बरे ॥ २ ॥ तस्मिन्नेव गिरिग्रामे तस्मिन्नेवालयाम्बरे । ब्राह्मणः स वसिष्ठाख्य आस्वादयति राजताम् ॥ ३ ॥ तमेव मण्डपाकाशकोणकं शून्यमात्रकम् । चतुःसमुद्रपर्यन्तं भूतलं सोऽनुभूतवान् ॥ ४ ॥ आकाशात्मनि भूपीठं तस्मिंस्तद्राजपत्तनम् । राजसद्मानुभवति स च सा चाप्यरुन्धती ॥ ५ ॥ लीलाभिधाना सा जाता तया च ज्ञप्तिरर्चिता । ज्ञप्त्या सह समुल्लङ्घ्य खमाश्चर्यमनोहरम् ॥ ६ ॥ प्रादेशमात्रे नभसि सा तत्रैवगृहोदरे । ब्रह्माण्डान्तरमासाद्य गिरिग्रामकमन्दिरे ॥ ७ ॥ ब्रह्माण्डात्परिनिर्गत्य स्वगृहे स्थितिमाययौ । स्वप्नात्स्वप्नान्तरं प्राप्य यथा तल्पगतः पुमान् ॥ ८ ॥ प्रतिभामात्रमेवैतत्सर्वमाकाशमात्रकम् । न ब्रह्माण्डं न संसारो न कुड्यादि न दूरता ॥ ९ ॥ स्वचित्तमेव कचति तयोस्तादृङ्मनोहरम् । वासनामात्रसोल्लेखं क्व ब्रह्माण्डं क्व संसृतिः ॥ १० ॥ निरावरणमेवेदं ज्ञप्त्याकाशमनन्तकम् । किंचित्स्वचित्तेनोन्नीतं स्पन्दयुक्त्येव मारुतः ॥ ११ ॥ चिदाकाशमजं शान्तं सर्वत्रैव हि सर्वदा । चित्त्वाज्जगदिवाभाति स्वयमेवात्मनात्मनि ॥ १२ ॥ येन बुद्धं तु तस्यैतदाकाशादप शून्यकम् । न बुद्धं येन तस्यैतद्वज्रसाराचलोपमम् ॥ १३ ॥ गृह एव यथा स्वप्ने नगरं भाति भासुरम् । तथैतदसदेवान्तश्चिद्धातौ भाति भास्वरम् ॥ १४ ॥ यथा मरौ जलं बुद्धं कटकत्वं च हेमनि । असत्सदिव भातीदं तथा दृश्यत्वमात्मनि ॥ १५ ॥ एवमाकथयन्त्यौ ते ललने ललिताकृती । गृहान्निर्ययतुर्बाह्यं चारुचक्रमणक्रमैः ॥ १६ ॥ आदृश्ये ग्रामलोकेन प्रेक्षमाणे पुरोगिरिम् । चुम्बिताकाशकुहरं संस्पृष्टादित्यमण्डलम् ॥ १७ ॥ नानावर्णाखिलोत्फुल्लविचित्रवननिर्मलम् । नानानिर्झरनिर्ह्रादकूजद्वनविहंगमम् ॥ १८ ॥ विचित्रमञ्जरीपुञ्जपिञ्जराम्बुदमण्डलम् । स्वभ्रमच्छगुलुच्छाग्रविश्रान्तखगसारसम् ॥ १९ ॥ सारवञ्जुलविस्तारगुप्ताखिलसरित्तटम् । असमाप्तशिलाश्वभ्रलतावर्तनमारुतम् ॥ २० ॥ पुष्पाग्रपिहिताकाशकोशकुड्यकवारिदम् । पतद्दीर्घसरित्स्रोतः स्फुरन्मुक्ताकलापकम् ॥ २१ ॥ चलद्वृक्षवनव्यूहवातवेल्लिसरित्तटम् । नानावनाकुलोपान्तच्छायासततशीतलम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, कहाँ ब्रह्माण्ड है, कहाँ उसकी दीवार है और कहाँ उसमें वज के तुल्य कठोरता है ? राजरानी लीला और सरस्वती देवी दोनों ही वस्तुतः उसी अन्तःपुर के आकाश में स्थित थी । उसी पर्वतग्राम में उसी गृहाकाश में पूर्वोक्त वसिष्ठनामक ब्राह्मण विदूरथ होकर राज्य के ऐश्वर्यका भोग करता है । उसने राजा पद्म बनकर उसी मण्डपाकाश के कोने को जो कि केवल शून्यमात्र है, चार सागरों से परिवेष्टित भूतल समझा वह वसिष्ठ और वह अरुन्धती दोनों उस शून्यस्वरूप मण्डपाकाश में चारों समुद्र पर्यन्त पृथिवी उसमें * ऐसी प्रसिद्धि है कि वातप्रेमी मृग स्वभावतः वायु की गति के अनुसार सम-विषम प्रदेशों में दौड़ता है, उसे कोई रोक नहीं सकता । राजधानीरूप नगर और राजधानी में राजमहल का अनुभव करते हैं ([-)) । वह अरुन्धती ही लीलानाम की राजरानी (पटरानी) हुई, उसने सरस्वती देवी की उपासना की । तदनन्तर वह सरस्वती देवी के साथ अद्भुत दर्शन से रमणीय आकाश को लाँघ कर गृहोदरवर्ती बिलस्तभर आकाश में ही दूसरे ब्रह्माण्ड को प्राप्त हुई और तदनन्तर पहले ब्रह्माण्ड से उसमें आकर गिरिग्राममन्दिररूप अपने घर में आई । जैसे कि शय्या में सोया हुआ पुरुष एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न को प्राप्त करता है, शय्या में ही विविध देशों में विविध स्वरूपों से भ्रमण करता है । आकाशरूप यह सब भ्रान्तिमात्र ही है, न ब्रह्माण्ड है, न संसार है, न दीवार आदि है और न दूरी है । उनका अपना चित्त ही केवल वासनामात्र से तत्‌ तत्‌ विविध पदार्थो के व्यवहार का स्वरूप धारण कर वैसा प्रतीत होता है । कहाँ ब्रह्माण्ड है और कहाँ संसार है निरावरण ओर निस्सीम इस चिदाकाश की ही उन्होंने अपने चित्त से कुछ (ब्रह्माण्डरूप) कल्पना की । जैसे आकाश ही स्पन्द के सम्बन्ध से वायुरूप से कल्पित होता है, वैसे ही उन्होने चिदाकाश की ही अपने चित्त से ब्रह्माण्डरूप से कल्पना की । सभी जगह सदा अनादि अविनाशी चिदाकाश ही व्याप्त है । जिसे उसका ज्ञान नहीं है, उसकी दृष्टि में वह स्वयं चित्‌ होने से अपने में अपने से ही जगत्‌ सा प्रतीत होता है । जिसने उसको जान लिया, उसकी दृष्टि में यह जगत्‌ आकाश से भी शून्य है और जिसने नहीं जाना, उसकी दृष्टि में यह जगत्‌ वज के समान कठोर पर्वत के तुल्य हे । जैसे स्वप्न में घर में ही दैदीप्यमान नगर की प्रतीति होती है, वैसे ही असद्‌ ही यह जगत्‌ चिदाकाश में प्रतीत होता है । जैसे मरुभूमि में असत्‌ जल की प्रतीति होती है, जैसे सुवर्ण में अविद्यमान कटकत्व की प्रतीति होती है, वैसे ही असत्‌ यह दृश्य प्रपंच आत्मा में सत्‌ सा प्रतीत होता है । - ऐसा कहती हुई वे दोनों सुन्दर ललनाएँ सुन्दर गति से घर के बाहर निकली । उन्हें ग्रामवासी नहीं देख पाते थे और वे सामने के पर्वत को देख रही थी। वह उत्तुंग पर्वत गगनचुम्बी था, सूर्यमण्डल को स्पर्श करता था, रंग-बिरंग के सम्पूर्ण फूले हुए विचित्र वनों से निर्मल था तथा उसमें अनेक झरनों का कलकल निनाद हो रहा था और वन के पंछी चहचहा रहे थे । उसमें ऊँचे ऊँचे वृक्षों की मंजरियों के पुंजों से पिंजर (लालिमा या भूरापन लिये हुए पीलेपन से युक्त) अतएव रंग-बिरंग के मेघमण्डल थे, इसलिए वह सुन्दर मेघों से युक्त था, उसमें गुलुच्छ लताओं की डालियों में पक्षी और सारस बसेरा ले रहे थे । बड़े मजबूत जलवेंतसों की झाड़ियों से नदियों के तट सुरक्षित (गिरने से बचे) थे, चट्टानों के गड्ढे में पैदा हुई लताओं को, जिन्होंने भली भाँति वृक्षों का अवलम्बन नहीं किया था, वायु खूब हिला रहा था, नचा रहा था । शिखर के वृक्षों ने, जिनकी आगे आगे की टहनियाँ फूलों से व्याप्त थी, आकाश की दीवार के सदुश बादलों को ढक रक्खा था । वेग से बह रही (3 वसिष्ठ नामक ब्राह्मण और अरुन्धती ही विदूरथ की वासना से उत्पन्न पद्म ओर लीला की अन्तरात्मता को प्राप्त हुए थे । लीला की अन्तरात्मा को प्राप्त अरुन्धती अनुभव करती है, यह मानकर वर्तमानकाल का निर्देश उत्पन्न होता है । विशाल नदी का स्रोत ही उसकी मुक्तामाला था । उस पर्वत के नदीतट हिल रहे वृक्षों के वृन्दों से युक्त वन समूह से व्याप्त थे, अतएव सदा वायु से वेष्टित रहते थे उसका प्रान्तभाग विविध वनों से व्याप्त था, अतएव छाया से सदा ठण्डक रहती थी