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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, Verses 43–63

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, verses 43–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 43-63

संस्कृत श्लोक

एकान्तसुप्तवत्सैककर्णस्पन्दास्तमक्षिकम् । गोपोच्छिष्टीकृतदधिखसृक्किस्पन्दिमक्षिकम् ॥ ४३ ॥ समस्तसद्मसंक्षीणमक्षिकाक्षिप्तमाक्षिकम् । फुल्लाशोकद्रुमोद्यानकृतलाक्षिकमन्दिरम् ॥ ४४ ॥ सीकरासारमरुता नित्यार्द्रविकचद्रुमम् । कदम्बमुकुलप्रोतसमस्तच्छादनतृणम् ॥ ४५ ॥ प्रतिकृत्तलताफुल्लकेतकोत्करपाण्डुरम् । वहत्प्राणालपटलीरणद्गुरुगुरारवम् ॥ ४६ ॥ वातायनगुहानिर्यत्सोधविश्रान्तवारिदम् । पूर्णपुष्करिणीपङ्क्तिपूर्णराजपृथूत्तरम् ॥ ४७ ॥ नीरन्ध्रविटपिच्छायाशीतलामलशाद्वलम् । सर्वशष्पाग्रवार्बिन्दुप्रतिबिम्बिततारकम् ॥ ४८ ॥ अनारतपतत्फुल्लहिमवर्षसितालयम् । विचित्रमञ्जरीपुष्पपत्रसत्फलपादपम् ॥ ४९ ॥ गृहकक्षान्तरालीनमेघसुप्तचिरण्टिकम् । सौधस्थमेघविद्युद्भिरनादेयप्रदीपकम् ॥ ५० ॥ कन्दरानिलभांकारघनघुंघुममण्डपम् । चरच्चकोरहारीतहरिणीहारिमन्दिरम् ॥ ५१ ॥ उन्निद्रकन्दलोद्वान्तमांसलामोदमन्थरैः । मरुद्भिर्मन्दमायातुमारब्धैर्लोलपल्लवम् ॥ ५२ ॥ लावकालापलीलायामालीनललनागणम् । कोककोकिलकाकोलकोलाहलसमाकुलम् ॥ ५३ ॥ शालतालतमालाब्जनीलतत्फलमालिनम् । वल्लीवलयविन्यासविलासवलितद्रुमम् ॥ ५४ ॥ आलोलपल्लवलतावलितायनानामुत्फुल्लकन्दलशिलीन्ध्रसुगन्धितानाम् । तालीतमालदलताण्डवमण्डपानामारामफुल्लकुसुमद्रुमशीतलानाम् ॥ ५५ ॥ साराववारिचलनाकुलगोकुलानामानीलसस्यकुसुमस्थलशोभितानाम् । तीरद्रुमप्रकरगुप्तसरिद्रयाणां नीरन्ध्रपुष्पितलताग्रवितानकानाम् ॥ ५६ ॥ उद्यानकुन्दमकरन्दसुगन्धितानां गन्धान्धषट्पदकुलान्तरिताम्बुजानाम् । सौन्दर्यतर्जितपुरन्दरमन्दिराणां राजीवराजिरजसारुणिताम्बराणाम् ॥ ५७ ॥ रंहोवहद्गिरिनदीरवघर्घराणां कुन्दावदातजलदद्युतिभासुराणाम् । सौधस्थितोल्लसितफुल्ललतालयानां लीलावलोलकलकण्ठविहङ्गमानाम् ॥ ५८ ॥ उल्लासिकौसुमदलास्तरणस्थयूनामापादमावलितमाल्यविलासिनीनाम् । सर्वत्र सुन्दरनवाङ्कुरदन्तुराणां शोभोल्लसद्वरलताकुलमार्गणानाम् ॥ ५९ ॥ संजातकोमललतोत्पलसंकुलानां । तिष्ठत्पयोदपटसंवलितालयानाम् । नीहारहारहरितस्थलविश्रुतानां सौधस्थमेघतडिदाकुलिताङ्गनानाम् ॥ ६० ॥ नीलोत्पलोल्लसितसौरभसुन्दराणां हुंकारहारिहीरतोन्मुखगोकुलानाम् । विश्रब्धमुग्धमृगसारगृहाजिराणामुन्नृत्यबर्हिघनसीकरनिर्झराणाम् ॥ ६१ ॥ सौगन्ध्यमत्तपवनाहतविक्लवानां वप्रौषधिज्वलनविस्मृतदीपकानाम् । कोलाहलाकुलकुलायकुलाकुलानां कुल्याकुलाकलकलाश्रुतसंकथानाम् ॥ ६२ ॥ मुक्ताफलप्रकरसुन्दरबिन्दुपातशीताखिलद्रुमलतातृणपल्लवानाम् । लक्ष्मीमनस्तमितपुष्पविकासभाजां शक्नोति कः कलयितुं गिरिमन्दिराणाम् ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

एकान्त स्थान में सोये हुए बछड़े के एक कान के कम्पन से मक्खियाँ उड़ रही थी, गोपों (गौओं को पालनेवाले अहीर आदि) द्वारा उच्छिष्ट यानी जूठा छोड़े हुए दही में और मुँह के आसपास मक्खियाँ भिनभिना रही थी । उस गाँव के सम्पूर्ण घरों में मधुमक्खियों का क्षय करके मधु संचित किया गया था, फूले हुए अशोक के वनों में लाह से रगे हुए सुन्दर क्रीड़ामन्दिर बने हुए थे । सीकरों की (छोटे-छोटे जलकणों की) डी लगानेवाले वायु से नित्य आर्द्र होने के कारण सभी वृक्ष प्रफुल्ल थे, फूलों के भार से लदे थे, कदम्बो की कलियों से उसमें सम्पूर्ण छादन तृण ओतप्रोत थे । केतकी के फूलने में जो लताएँ बाधक थी, उन लताओं के काट डालने के कारण निर्बाधरूप से फूले हुए केतकियों के समूह से सारा गाँव सफेद हो रहा था । उस ग्राम के किसी किसी प्रदेश मेँ जल की नाली द्वारा जल गुरु गुरु शब्द करता हुआ बहता था । मेघमण्डल उसके झरोखों से निकलकर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में विश्राम लेते थे। जल से लबालब भरे हुए अनेक पोखरों में पूर्ण चन्द्रमा के समान खिले हुए कमलवनों से उसकी शोभा की सीमा न रह गई थी । उसमें सघन वृक्षों की छाया से शीतल साफ सुथरे हरे मैदान थे और सम्पूर्ण हरी-रही घास के सिरो पर जो ओस की बूँदें थी, उनमें तारो का प्रतिबिम्ब पड रहा था । लगातार गिर रहे खिले फूलों की वृष्टि से और हिमवृष्टि से उस ग्राम के सब मकान सफेद हो गये थे । उस ग्राम के सब वृक्ष भाँति-भाँति की मंजरियों, फूलों, पत्तों ओर सुन्दर फलों से लदे थे उस घर की कोठरी के अन्दर छिपे हुए बादलों में युवतियाँ सोती थी ओर अट्टालिकाओं में स्थित र यहाँ पर गाँव का वर्णन चल रहा है । “गाँव” शब्द गाँव की सीमा और भूमि के सहित गाँव का वाचक है, इसलिए उसके अन्तर्गत गोचरभूमि, जंगल, निकुज आदि का वर्णन करने पर भी कोई विरोध नहीं है। मेघ की बिजली से लोगों को दीपक जलाने की आवश्यकता न रहती थी, क्योकि दीपक की आवश्यकता बिजली से पूरी हो जाती थी | उस गाँव में सब घर गुफाओं की वायु की झंकार से मेघ की नाईं गरजते थे, घरों के आसपास चकोर, हारीत और हिरन घूमते थे, अतएव वे बड़े मनोहर लगते थे । खिले हुए कन्दल पुष्पों से निःसृत प्रचुर सुगन्धि से परिपूर्ण मन्द- मन्द बहने के लिए उद्यत वायु द्वारा उसके वृक्ष ओर लताओं के पल्लव चंचल थे । सुग्गा, मैना ओर लवा की बोली रूपी क्रीड़ा में ललनाएँ तल्लीन थीं । चक्रवाक, कोयल, पहाड़ी कौओं के कोलाहल का चारों ओर समां वेधा था | साल, ताड, तमाल और कमल तथा उनके नीले फलों का, जिधर देखो उधर, ताँता बँधा था । वहाँ पर लताओं के वलयाकार वेष्टन से वृक्ष परिवेष्टित थे । उक्त गिरिग्राम के मन्दिरोँ की शोभा का पूर्णरूप से वर्णन कोन कर सकता है ? वे चंचल पल्लववाली असंख्य लताओं के सन्तान के आश्रय थे, खिले हुए कन्दल के फूलों की सुगन्धि से सराबोर थे, उनके मण्डपों मेँ ताली, तमाल आदि के पत्ते नाचते, बाग में खिले हुए फूलों के वृक्षों से उनमें बड़ी ठण्डक रहती थी, उनकी गौएँ र₹ँभाती हई जल में तैरने में आकुल थी, उनके आसपास चारों ओर के लललहाते हुए धान के खेतों और फूलों के बगीचों से उनकी शोभा कहीं अधिक बढ़ गई थी, तट के वृक्षों की कतार से नदी का प्रवाह छिप गया था, फूली हुई सघन लताओं के अग्रभाग ही उसके वितान (चँदवे) थे बगीचों के कुन्द पुष्पों के मकरन्द की (पुष्परस की) भीनी-भीनी सुगन्ध से वे सुगन्धित थे, सुगन्धि से अन्धे बने हुए भ्रमरो ने गिरिग्राम के घरों के आस-पास के कमलो को आच्छन्न कर दिया था, उन घरों ने अपनी सुन्दरता से इन्द्र भवन को नीचा दिखा दिया था, कमलो के पराग से उन्होने आकाश को सुनहला बना दिया था, उनमें वेग से बह रही गिरिनदी का घर-घर शब्द सदा बना रहता था, कुन्दपुष्प के समान सभेदमेघों की छवि से वे देदीप्यमान हो रहे थे , अटारियों पर आरूढ फूली हुई विशाल लताओं के वे आश्रय थे, उन घरों में परस्पर क्रीडा से चंचल मधुर ध्वनिवाले पक्षियों का आवास था, तुरन्त खिले हुए पुष्पों की पँखुड़ियों से युवकों की शय्या पूर्ण थी, स्त्रियाँ पैर के अँगूठे तक लटकी हुई मालाएँ पहनी थी, सभी जगह सुन्दर-सुन्दर नूतन अंकुर उगे थे, जिनसे वे घर दन्तुल से (जिसके छोटे-छोटे दाँत निकले हो ऐसे) प्रतीत होते थे, अत्यन्त सुशोभित सुन्दर लताओं से सरकण्डे घिरे थे, उगी हुई कोमल-कोमल लताएँ ओर कमलों की उनमें भरमार थी, स्थिर मेघरूपी वस्त्रों से घरों के कमरे आच्छादित (वितानयुक्त) थे, ओस की बूँदरूपी मोतियों की लहरों से युक्त हरी घास के मैदानों से जहाँ-तहाँ उनकी बड़ी ख्याति थी, अटारियों में रुके हुए मेघ की बिजली से घरों में सत्यँ आकुल हो रही थी, नील कमलों से निर्गत सुगन्धि से उनकी सुन्दरता कहीं अधिक बढ़ गई थी, वहाँ की गौएँ रंभाने से बड़ी भली लगनेवाली और हरी घास को चरने में संलग्न थी, घर के आँगन में सुन्दर मृग नि:शंक आ जा रहे थे, उक्त घर निबिड जलबिन्दुओं की वृष्टि करनेवाले झरनों से युक्त थे, अतएव वृष्टि की भ्रान्ति से उनमें मयूर अपना नृत्य करते थे, वे सुगन्धि से मत्त की नाई भ्रान्त पवन से ताडित अतएव विकलता को प्राप्त हुए थे, दीवारों में उगी हुई औषधिरूपी (ज्योतिर्लतारूपी) अग्नि से वे घर दीपकों को भूल गये थे, औषधियों से ही उनमें दीपकों का काम चल जाता था, पक्षियों के कलरव से परिपूर्ण अनेक घोसलों से वे घर व्याप्त थे, सैकड़ों झरनों के अविरत कलरव से लोगों की बोल- चाल छिप गई थी, मोतियों की लरी के समान सुन्दर बिन्दुओं के गिरने से उनके सम्पूर्ण वृक्ष, लता, तृण ओर पल्लव शीतल थे और उनके फूलों का विकास कभी बन्द नहीं होता था ऐसे गिरिग्राम के मंदिरों की शोभा का वर्णन कौन कर सकता है ?