Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, Verses 23–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 28, verses 23–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 23-33
संस्कृत श्लोक
अथ ते ललने तत्र तदा ददृशतुः स्वयम् ।
तं गिरिग्रामकं व्योम्नः स्वर्गखण्डमिव च्युतम् ॥ २३ ॥
रटत्प्रणालीपटलं पूर्णपुष्करिणीगणम् ।
द्विजैः कुचकुचैः कूजत्स्वलीलाश्वभ्रकच्छकम् ॥ २४ ॥
गच्छद्गोवृन्दहुंकारकरालाखिलकुञ्जकम् ।
कुञ्जगुल्मकखण्डाढ्यं सच्छायघनशाद्वलम् ॥ २५ ॥
दुष्प्रवेशार्ककिरणं दृशन्नीहारधूसरम् ।
उदग्रमञ्जरीपुञ्जजटालं विशिखान्तरम् ॥ २६ ॥
शिलाकुहरवाःस्फालप्रोच्चलन्मुक्तनिर्झरैः ।
स्मारिताचलनिर्धूत्क्षीरोदकजलश्रियम् ॥ २७ ॥
फलमाल्यमहाभारभासुरैरजिरद्रुमैः ।
आनीय पुष्पसंभारं तिष्ठद्भिरिव संकुलम् ॥ २८ ॥
तरत्तरङ्गझांकारकारिमारुतकम्पितैः ।
कीर्णपुष्पसमावृष्टं द्रुमैरपि रसाकुलैः ॥ २९ ॥
अशङ्कितशिलाकूटस्रवदब्बिन्दुटंकृतैः ।
किंचित्कृतरवं गुप्तैरशङ्कैः शङ्कितैः खगैः ॥ ३० ॥
उत्फाललहरीश्रान्तसीकरास्वादनाकुलैः ।
नद्यामुडुपरावर्तवृत्तिभिर्विहगैर्वृतम् ॥ ३१ ॥
उत्तालतालविश्रान्तकाकालोकनशङ्कितैः ।
बालैः प्रगोपितामिक्षाखण्डं जीर्णस्वभुक्तकैः ॥ ३२ ॥
पुष्पशेखरसंभारवसनग्रामबालकम् ।
खर्जूरनिम्बजम्बीरगहनोपान्तशीतलम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वत का वर्णन कर पर्वतग्राम का वर्णन करते हैं।
तदनन्तर उन दोनो ललनाओं ने उस समय वहीं स्वयं पर्वतग्राम को देखा, वह आकाश से
गिरे स्वर्ग के एक भाग के समान रमणीय था, उसमें रहटों के चलने का शब्द हो रहा था, जहाँ
तहाँ कमलों से युक्त अनेक पोखरे बने थे, पक्षियों के कलरव से सारा नगर गुलजार था ओर
उसमें क्रीडा के लिए बने हुए उत्तम निम्नस्थान और जलप्रदेश थे । गोचरभूमि में चल रहीं गायों
के रांभने से उसके सम्पूर्ण निकुज शब्दायमान हो रहे थे, ओर कुंजों झाड़ियों, छायादार सघन
हरे घास के मेदानों से वह युक्त था । उसमें सूर्य की किरणों का प्रवेश बड़ी कठिनाई से होता
था, वह शिलाओं तथा नीहार से भस्मलिप्त की नाई धूसर था । ऊँची-ऊँची मंजरियो से जटा
की नाई लम्बायमान उसकी कतिपय शिखाएँ थी । चट्टानों के मध्य में जल के टकराने से
जिनमें मोती के सदुश बिन्दु उछल रहे थे ऐसे रनों ने उसमें मन्दराचल से मथे जाते हुए
क्षीरसागर के जल की शोभा का स्मरण करा रखा था । फल और फूलों से लदे होने के कारण
बड़े अच्छे प्रतीत होनेवाले आँगन के वृक्षों से वह व्याप्त था । वे वृक्ष ऐसे प्रतीत होते थे मानों
पुष्पराशि को लाकर खड़े हो रहे हों । उसमें चंचल तरगों को मुखरित करनेवाले पवनों द्वारा
हिलाये गये, मकरन्द से व्याप्त वृक्ष भी अतिथियों पर फूल बरसाते थे फिर प्रेमपूर्ण अतिथि
सत्कार करनेवाले मनुष्यों से वह अधिष्ठित था इसमें कहना ही क्या है ? बराबर पाषाणो से
गिर रहीं जल की बूँदो की टंकारध्वनि से, गुलेल ओर धनुष के शब्द के तुल्य होने के कारण,
भय के योग्य न होने पर भी भयभीत अतएव छिपेहुए पक्षियों ने उसमें कुछ कलरव कर रक्खा
था। वह नदी में उत्तुंग लहरों में बैठे हुए और तरंग के जलबिन्दु ओं के आस्वादन से शान्त चित्त
एवं नक्षत्रों के परिवर्तन के समान परिवर्तनवाले हंसों से परिवृत था । ऊँचे-ऊँचे ताल वृक्षों पर
बैठे हुए कौओं को देखकर ये हमारे कलेवेको खा न जाये, इस प्रकार शंकित हुए बालकों द्वारा
प्रातःकाल का खाना पच जाने के बाद हम इसे खायेंगे इस बुद्धि से उसमें आमिक्षा (छेना)
छिपाई गई थी । उस नगर में बालकों ने फूलों के ही मुकुट आदि सिर के आभूषण ओर वस्त्र
पहने थे, उस नगर के आस-पास खजूर, नींबु, जम्बीर के निबिड वन थे, अतएव वह सदा
शीतल रहता था