Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तत्रस्थे वाथ चिद्वृत्त्या पुप्लुवाते नभस्थलम् ।
कोटियोजनविस्तीर्णं दूराद्दूरतरान्तरम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त उसी घर में स्थित होकर “हम लोग आकाश में संचरण करें“ इत्याकारक
चित्प्रधान मानस कल्पनावृत्ति से दूर से अतिदूर तथा करोड़ों योजन विस्तीर्ण आकाश में
उन्होने संचरण किया । भाव यह कि लीला और सरस्वती पहले ही अपने मन में “हम लोग
आकाशमार्ग से जायेंगे" यों संकल्प करके समाधिस्थ हुई थी । इसी कारण उन्हें समाधि
अवस्था में तदनुरूप चित्तदेह के प्राप्त होने पर आकाश में उड़ने का अनुभव होने लगा