Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verses 1–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, verses 1–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 1-7
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति संकथनं कृत्वा तस्यां निशि वराङ्गने ।
सुप्ते परिजने नूनमथान्तःपुरमण्डपे ॥ १ ॥
दृढाखिलार्गलद्वारगवाक्षे दक्षचेतसि ।
पुष्पप्रकरनिष्ठयूतमांसलामोदमन्थरे ॥ २ ॥
अम्लानमालावसनशवपार्श्वासनस्थिते ।
सकलामलपूर्णेन्दुवदनद्योतितास्पदे ॥ ३ ॥
समाथिस्थानकं गत्वा तस्थतुर्निश्चलाङ्गिके ।
रत्नस्तम्भादिवोत्कीर्णे चित्रे भित्ताविवार्पिते ॥ ४ ॥
सर्वास्तत्यजतुश्चिन्ताः संकोचं समुपागते ।
दिवसान्त इवाब्जिन्यौ प्रसृतामोदलेखिके ॥ ५ ॥
बभूवतुर्भृशं शान्ते शुद्धे स्पन्दविवर्जिते ।
गिरौ शरदि निर्वात इव भ्रष्टाभ्रमालिके ॥ ६ ॥
निर्विकल्पसमाधानाज्जहतुर्बाह्यसंविदम् ।
यथा कल्पलते कान्ते पूर्वमृत्वन्तरे रसम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, वे दोनों उत्तम देवियाँ यानी सरस्वती और लीला उस रात्रि में
परस्पर प्रश्नोत्तर कर जब कि सब सेवक सो गये थे, महल के दरवाजों ओर खिडकियो में
मजबूत ओर भाँति-भाँति के अर्गल लग गये थे, ड्योढ़ियों पर पहरेदार सावधान होकर पहरा
दे रहे थे, फूलों की राशियों से निर्गत एवं घनीभूत सुगन्धि से अन्तःपुर भर गया था, अम्लान
मालारूपी वस्त्रो से आच्छन्न राजा के शव के समीपस्थ आसन पर बैठ गई । उनके कलंकशून्य
पूर्ण चन्द्रमा के तुल्य मुखमण्डल से सारा अन्तःपुर जगमगा उठा वे दोनों ({-)) समाधिस्थ
हो इस प्रकार निश्चलता से बैठ गई कि प्रतीत होता था मानों वे रत्न के खम्भे में खुदी हुई दो
मूर्तिर्यो हैं एवं दिवार में लटकाये गये दो चित्र हैं | सम्पूर्ण इन्द्रियों को उनके विषयों से संकोच
को (निवृत्तिको) प्राप्त हुई उन दोनों की सम्पूर्ण दुश्चिन्ताएँ गायब हो गई, अतएव वे सायंकाल
के समयकी दो कमलिनियों की नाई थी, जिनके चारों ओर परिमल व्याप्त रहता हे । शरद
ऋतु में वायु शून्य पर्वत में गिरी हुई दो मेघ पंक्तियाँ जैसे शुद्ध (सफेद), शान्त (शीतल)
और कम्पन शून्य होती हैं, वैसे ही वे भी अत्यन्त शुद्ध, शान्त ओर स्पन्दन शून्य हुई । चूँकि
उन्हें निर्विकल्प समाधि लग गई थी, अतएव उनको देह आदि अनात्मवस्तुओं का प्रतिसन्धान
नहीं रह गया था । जैसे सुन्दर दो कल्पलताएँ वसन्तआदि ऋतु के प्राप्त होने पर पहले के रस
का त्याग करती हैं, कारण कि पुराने पत्तों का सूखना आदि सभी को दिखलाई देता है, वैसे ही
उन्होंने भी बाह्य ज्ञान का त्याग कर दिया था
सर्ग सन्दर्भ
बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग पर्वत-ग्राम को देखने की इच्छा से समाधि द्वारा स्थूल देह का परित्याग कर देवीजी ओर लीला का विशाल आकाश में गमन-वर्णन |