Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verses 8–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 8-10
संस्कृत श्लोक
अहं जगदिति भ्रान्तिदृश्यस्यादावनुद्भवः ।
यदा ताभ्यामवगतस्यवत्यन्ताभावनात्मकः ॥ ८ ॥
तदा दृश्यपिशाचोऽयमलमस्तं गतो द्वयोः ।
असत्त्वादेव चास्माकं शशशृङ्गमिवानघ ॥ ९ ॥
आदावेव हि यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
भातं वाऽभातमेवातो मृगतृष्णाम्बुवज्जगत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य के आत्यन्तिक उपशम से (विनाश से) निर्विकल्प समाधि होने पर तत्त्वसाक्षात्कार
से समूल त्रैकालिक दृश्यबाध ही परिनिष्ठित हेतु है, ऐसा कहते हैं ।
पहले जब उन दोनों को मैं जगत्“ इस प्रकार भ्रान्तिरूप दृश्य की अत्यन्ताभावरूप
अनुत्पत्ति का ज्ञान हुआ, तब उन दोनों का द्वश्यरूपी यह पिशाच अत्यन्त विनष्ट हो गया ।
जैसे समाधि में त्रैकालिक दृश्य का बाध होता है, वैसा सभी काल में त्रैकालिक दृश्य का बाघ
हम लोगों के अनुभव से सिद्ध है, ऐसा श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी को सम्बोधन कर कहते हैं ।
अनघ, असत् (मिथ्या) होने के कारण ही हम लोंगों की दृष्टि से यह जगत् प्रतीत होने पर
मृगतृष्णा में जल की नाई और प्रतीत न होने पर खरगोश के सींग की नाई है, क्योकि जो
पदार्थ पहले नहीं था वह वर्तमान काल में भी नहीं है, यह स्पष्ट है