Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 23, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तेनैव ज्ञानदेहेन चचार ज्ञप्तिदेवता ।
मानुषी त्वितरेणाशु ध्यानज्ञानानुरूपिणा ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
आगे सर्ग में कहे जानेवाले आकाशगमन में देवी सरस्वती और लीला के देहवैलक्षण्य को
कहते हैं।
ज्ञानदेवी सरस्वती ने पूर्वतन ज्ञानदेह से ही आकाश में विचरण किया और राजमहिषी
लीला ने मानव देह के अभिमान का परित्याग कर ध्यान और ज्ञान के अनुरूप दिव्यदेह का
अवलम्बन कर आकाशमें विचरण किया