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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verses 14–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, verses 14–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 14-18

संस्कृत श्लोक

रघूणामेष सर्वेषां प्रभुः कुलगुरुः सदा । सर्वज्ञः सर्वसाक्षी च त्रिकालामलदर्शनः ॥ १४ ॥ वसिष्ठ भगवन्पूर्वं कच्चित्स्मरसि यत्स्वयम् । आवयोर्वैरशान्त्यर्थं श्रेयसे च महाधियाम् ॥ १५ ॥ निषधाद्रेर्मुनीनां च सानौ सरलसंकुले । उपदिष्टं भगवता ज्ञानं पद्मभुवा बहु ॥ १६ ॥ येन युक्तिमता ब्रह्मन्ज्ञानेनेयं हि वासना । सांसारी नूनमायाति शमं श्यामेव भास्वता ॥ १७ ॥ तदेव युक्तिमज्ज्ञेयं रामायान्तेनिवासिने । ब्रह्मन्नुपदिशाशु त्वं येन विश्रान्तिमेष्यति ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि प्रश्न हो कि आप ही उपदेश क्यो नहीं देते ? तो इस पर कहते हैं। ये महात्मा सम्पूर्ण रघुवंशियों के नियन्ता (शिक्षक) तथा कुलगुरु, सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी एवं तीनों कालों में मोह आदि से अनभिभूत हैं । भगवन्‌ वसिष्ठजी, आपके और मेरे वैर को शान्त करने के लिए और महामति मुनियों के कल्याण के लिए, देवदार के वृक्षों से आवृत्त निषध पर्वत के शिखरपर, भगवान्‌ ब्रह्माजी ने स्वयं पहले जिस ज्ञान का उपदेश दिया था, उसका आपको स्मरण है ? ब्रह्मन्‌, जिस युक्तिपूर्वक ज्ञान से यह सांसारिक वासना जैसे सूर्य के उदय से रात्रि नष्ट हो जाती है वैसे ही निस्सन्देह नष्ट हो जाती है आप उसी उपपत्तियुक्त ज्ञातव्य वस्तु का समीप में स्थित (शिष्यभूत) श्रीरामचन्द्रजी को शीघ्र उपदेश दीजिये, जिससे ये अवश्य विश्रान्ति को प्राप्त हो जायेंगे