Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verses 2–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
ज्ञेयमेतेन विज्ञातमशेषेण मुनीश्वराः ।
स्वदन्तेऽस्मै न यद्भोगा रोगा इव सुमेधसे ॥ २ ॥
ज्ञातज्ञेयस्य मनसो नूनमेतद्धि लक्षणम् ।
न स्वदन्ते समग्राणि भोगवृन्दानि यत्पुनः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त बात का ही सम्पूर्ण मुनियों की सम्मति से समर्थन करने के लिए “मुनीश्वराः” सव मुनियों
का संबोधन है ।
हे मुनिवरो, श्रीरामचन्द्र ने ज्ञातव्य वस्तु सम्पूर्णतया जान ली है, क्योंकि सुमति श्रीराम को भोग
रोगों की नाई रुचिकर नहीं हो रहे हैँ । जिसने ज्ञातव्य वस्तु को जान लिया है, उसके मन का यही निश्चित
लक्षण है कि उसको फिर सम्पूर्ण भोग भले नहीं लगते । अज्ञान से उत्पन्न संसाररूपी बन्धन भोगों की
वासना से दृढ़ हो जाता है और जगत् मेँ भोगवासना के शान्त होने पर बन्धन भी क्षीण हो जाता है