Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 12-13
संस्कृत श्लोक
केवलं केवलीभावविश्रान्तिं समपेक्षते ।
रामबुद्धिः शरल्लक्ष्मीः खलु विश्रमणं यथा ॥ १२ ॥
अत्रास्य चित्तविश्रान्त्यै राघवस्य महात्मनः ।
युक्तिं कथयतु श्रीमान्वसिष्ठो भगवानयम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शरत्काल की शोभा
मेघरहित निर्मल आकाशमात्र की अपेक्षा करती है वैसे ही शरत्-शोभा के समान निर्मल श्रीरामचन्द्रजी
की बुद्धि द्वैतनिरास में विश्वास द्वारा केवल अद्वितीय चिन्मात्र के अवशेष की अपेक्षा करती है। यहाँ पर
महात्मा श्रीरामचन्द्रजी की चित्तविश्रान्ति के लिए ये श्रीमान् भगवान वसिष्ठजी युक्ति का उपदेश देने
की कृपा करें