Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, Verses 25–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 2, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 25,27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मुने यदादिशसि मे तदविघ्नं करोम्यहम् ।
कः समर्थः समर्थोऽपि सतां लङ्घयितुं वचः ॥ २५ ॥
अहं हि राजपुत्राणां रामादीनां मनस्तमः ।
ज्ञानेनापनयाम्याशु दीपेनेव निशातमः ॥ २६ ॥
स्मराम्यखण्डितं सर्व संसारभ्रमशान्तये ।
निषधाद्रौ पुरा प्रोक्तं यज्ज्ञानं पद्मजन्मना ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : मुनिवर, जिस कार्य के लिए आप मुझे अदेश देते हैं, उसे मैं निर्विघ्न
करता हू । सामर्थ्य होते हुए भी सन्तो के वचन को टालने की किसमें शक्ति है ? जैसे लोग दीपक से
रात्रि का अन्धकार दूर करते हैं, वैसे ही मेँ श्रीराम आदि राजकुमार के अन्तःकरण के अज्ञान को
ज्ञान से शीघ्र दूर करता हूँ । पहले भगवान् ब्रह्मा ने संसाररूप भ्रम को दूर करने के लिए जिस ज्ञान का
निषध पर्वतपर उपदेश दिया था, उसका मैं ज्यों का त्योँ आद्योपान्त स्मरण करता हूँ