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Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 14

16 verse-groups

  1. Verse 1सदश अस्थिर है, वह उन्मत्त के समान असमय में ही इस कुत्सित शरीर को छोडकर चली जाती है, अर्था…
  2. Verse 2जिन लोगों के चित्त विषयरूपी सर्पो के संसर्ग से सर्वथा जर्जर (शिथिल) है और जिनमें दृढ आत्म…
  3. Verse 3क्या ब्रह्मवेत्ताओं की आयु भी व्यर्थ ओर क्लेशजनक है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। जो लोग ज…
  4. Verses 4–6हे महामुने, हम लोग देह आदि को ही “यह आत्मा है", ऐसा निश्चय कर बैठे हैं, हमें संसाररूपी मे…
  5. Verse 7तरंग को, जल आदि में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा को, बिजली को और आकाशकमल को हाथ से पकड़ने का मुझ…
  6. Verse 8जैसे खच्चरी दुःख के लिए ही गर्भ धारण करती है, (क्योंकि उसका पेट फाड़कर ही गर्भ निकलता है,…
  7. Verse 9इस संसार से संभ्रमण में वल्लीरूप शरीर सृष्टिरूपी सागर में जल का विकार फेन रूप है, जैसे सा…
  8. Verse 10जिससे अवश्य प्राप्तव्य वस्तु की (परम पुरुषार्थ रूप मुक्ति की) प्राप्ति की जाती है, जिससे…
  9. Verses 11–12वृक्ष भी जीते हैं और मृग-पक्षी भी जीते ही हैं, पर उसी पुरुष का जीना जीना है जिसका मन मनन…
  10. Verse 13अपवित्र देह में आत्मबुद्धि करनेवाले अविवेकी के लिए शास्त्र भाररूप है अर्थात्‌ भार के समान…
  11. Verses 14–15दुर्बुद्धि पुरुष के लिए आयु, मन, बुद्धि, अहंकार तथा चेष्टा ये सब भारवाहक के भार के समान द…
  12. Verses 16–17जैसे चूहा प्रतिदिन आलस्य का त्यागकर लगातार धीरे-धीरे पुराने टीले को खोदकर नष्ट कर देता है…
  13. Verses 18–20सदा लकड़ी का बुरादा गिरा रहे वृक्ष के भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे दुष्ट दीमकों द्वारा पुराना…
  14. Verse 21जैसे बिल्ली शीघ्र निगलने के लिए उत्कट अभिलाषापूर्वक चूहे को देखती है वैसे ही मृत्यु शीघ्र…
  15. Verse 22जैसे लम्पट लोग (महाविषयी पुरुष) सौन्दर्य के अभिलाषी होते हैं वैसे ही विनाश का मित्र और वृ…
  16. Verse 23हे मुनिवर, अधिक क्या कहें, जीवन्मुक्त पुरुषों द्वारा अनुभूत नित्य सुख और स्थिरता से सर्वद…