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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verses 18–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

प्रस्नुवानैरविच्छेदं तुच्छैरन्तरवासिभिः । दुःखैरावृश्च्यते क्रूरैर्घुणैरिव जरद्द्रुमः ॥ १८ ॥ नूनं निगरणायाशु घनगर्धमनारतम् । आखुर्मार्जारकेणेव मरणेनावलोक्यते ॥ १९ ॥ गन्धादिगुणगर्भिण्या शून्ययाऽशक्तिवेश्यया । अन्नं महाशनेनेव जरया परिजीर्यते ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

सदा लकड़ी का बुरादा गिरा रहे वृक्ष के भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे दुष्ट दीमकों द्वारा पुराना पेड़ काटा जाता है, वैसे ही सदा पीव-रक्त और मल बहा रहे शरीर में रहनेवाले तुच्छ और दुष्ट रोग आदि दुःखों द्वारा चारों ओर से आयु काटी जा रही है